रबीन्द्रनाथ टैगोर की जीवनी Rabindranath Tagore Biography in Hindi

रबीन्द्रनाथ टैगोर की जीवनी Rabindranath Tagore Biography in Hindi

रबीन्द्रनाथ टैगोर  महान कवि, संगीतज्ञ, चित्रकार, शिक्षक, शिक्षा-शास्त्री एवं समाज सुधारक थे. वे नोबल पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले भारतीय थे. वे गुरुदेव उपनाम से विख्यात हुए. उन्होंने भारत के राष्ट्रगान जन गण मन… की रचना की.  

संक्षिप्त जीवनी Brief Biography

रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 6 मई, 1861 को कोलकाता के एक प्रतिष्ठित और कला प्रिय परिवार में हुआ. रबीन्द्रनाथ के पिता का नाम देबेन्द्रनाथ टैगोर और माता का नाम शारदा देवी था. उनके पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर आदि ब्रह्म-समाज के नेता थे. 

रबीन्द्रनाथ टैगोर यूं तो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, पर  बंगाली साहित्य में उनका अप्रतिम योगदान रहा. उन्होंने महाकाव्य को छोड़कर तकरीबन सभी विधाओं में साहित्य रचना की. रबीन्द्रनाथ ने करीब ढाई हजार गीत लिखे और संगीतबद्ध किए. जीवन के अंतिम वर्षों में उनका झुकाव पेंटिंग की ओर हुआ और उन्होंने करीब 3 हजार पेंटिंग्स बनाई.

रबीन्द्रनाथ टैगोर ने ज्यादातर कहानियां और कविताएं अपनी मातृभाषा बांग्ला में लिखीं. रबीन्द्रनाथ को जब  उनकी कृति गीतांजलि के लिए साहित्य का नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया, तो उनकी ख्याति भारत से बाहर पूरी दुनिया में फैल गई. वे दुनिया के संभवतः इकलौते ऐसे शख्स होंगे जिनकी रचनाओं को दो देशों ने राष्ट्रगान के रूप में अपनाया. भारत में उनकी कृति जन गण मन… राष्ट्रगान है, वहीं जब बांग्लादेश का गठन हुआ तो उनके गीत आमार सोनार बांग्ला को वहां राष्ट्रगान बनाया गया. यही नहीं, श्रीलंका का राष्ट्रगान भी उनकी एक रचना से प्रेरित है.  

आरम्भिक जीवन Early Life

टैगोर परिवार कलकत्ता (कोलकाता) के जाने-माने परिवारों में शुमार होता था. रबीन्द्रनाथ के दादा द्वारकानाथ टैगोर ने अच्छी-खासी जायदाद बनाई थी, जिसे उनके पिता ने बखूबी संभाला और बढ़ाया था.  रबीन्द्रनाथ अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान थे और आठवें पुत्र थे. उनके बड़े भाई सत्येन्द्रनाथ आईसीएस परीक्षा पास करने वाले  प्रथम भारतीय थे. 

छोटी अवस्था में ही रबीन्द्रनाथ की माता का निधन हो गया था. बाल्यावस्था से ही रबीन्द्र को प्रकृति से प्रेम था. वे रीति-रिवाजों की तनिक भी परवाह नहीं करते थे और स्वतन्त्र स्वभाव के स्वामी थे.

उन्होंने अपने प्रकृति-प्रेम के सम्बन्ध में स्वयं लिखा है, ‘मुझे हर सवेरा सुनहरी किनारे वाला लिफाफा-सा प्रतीत होता था, जो मेरे लिए कोई अनसुना समाचार लाया हो.’ बचपन में ही वे प्रकृति के नजदीक आ गए थे. वे न घर वाले शिक्षकों की सुनते थे और न विद्यालयों से ही प्रेम करते थे.
इसी बीच परिजनों ने रबीन्द्रनाथ ने बोलपुर गांव में भेज दिया गया. वहां जाकर उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया. वे गांवभर का भ्रमण करके गरीब लोगों से मिलते-जुलते और उनके सुख-दुख में सहयोग देते थे. वे अधिक से अधिक समय प्रकृति के सान्निध्य में बिताया करते थे. वहां उनमें अपने भाव प्रकट करने की प्रबल प्रेरणा उत्पन्न हुई. इस तरह उनकी कविता का प्रवाह आरम्भ हुआ. 

रबीन्द्रनाथ की शिक्षा-दीक्षा
Education of Rabindranath

रबीन्द्र की शिक्षा घर पर ही हुई. उनके पिता ने उन्हें स्कूल भेजने का हठ कभी नहीं किया. परन्तु सम्बन्धी चाहते थे कि रबीन्द्र उच्च शिक्षा प्राप्त करें. इसी उद्देश्य से 1877 में उन्हें इंग्लैंड भेजा गया,  किन्तु वे वर्ष भर के बाद कोरे लौट आए. एक बार पुनः इंग्लैंड भेजा गया था कि कानून पढ़ आयें, किन्तु वे पूर्ववत ज्यों-के-त्यों वापस आ गए.

रबीन्द्रनाथ टैगोर ने 1878 में लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन बिना डिग्री की पढ़ाई पूरी किए ही वे भारत लौट आए. हालांकि, 1940 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टरेट की मानद उपाधि प्रदान की. 

रबीन्द्रनाथ का वैवाहिक जीवन
Married life of Rabindranath Tagore

रबीन्द्रनाथ के बड़े भाई ज्योतिन्द्रनाथ टैगोर की पत्नी कादम्बरी देवी की साहित्य में गहरी रुचि थी. रबीन्द्रनाथ के साहित्य की वे बड़ी प्रशंसक थीं.  रबीन्द्रनाथ टैगोर का विवाह 1883 में मृणालिनी देवी से हुआ. विवाह के वक्त मृणालिनी देवी का नाम भाबतारिणी था और उनकी उम्र मात्र 10 वर्ष थी, जबकि रबीन्द्रबाबू 22 वर्ष के थे. रबीन्द्रनाथ के विवाह के चार माह बाद ही कादम्बरी देवी ने आत्महत्या कर ली. उस समय, वे सिर्फ 25 वर्ष की थीं. गुरुदेब ने अपनी कुछ कविताएं और पुस्तकें उन्हें भी समर्पित कीं. 

टैगोर परिवार के कई सदस्यों का मानना था कि भाबतारिणी नाम पुरानी तरह का है, इसलिए रबीन्द्रनाथ के बड़े भाई द्विजेन्द्रनाथ की सलाह पर भाबतारिणी का नाम बदलकर मृणालिनी देवी रख दिया गया. मृणालिनी पढ़ी-लिखी नहीं थीं, इसलिए रबीन्द्रबाबू ने उन्हें पढ़ने के लिए लॉरेटो स्कूल भेजा.  दोनों की पांच संतानें हुईं.

1890 में पिता ने अपनी जमींदारी की देख-भाल के लिए रबीन्द्रनाथ को शिलैडहा कुटीबाड़ी (अब बांग्लादेश में) जाने की आज्ञा दी. 1898 में उनकी पत्नी और बच्चे भी वहां पहुंच गए. करीब ग्यारह वर्ष तक वे शिलैडहा रहे, इसके बाद वे शांति निकेतन आ गए. 

रबीन्द्र और मृणालिनी का शादीशुदा जीवन 19 वर्ष ही चला. वर्ष 1902 में शांति निकेतन में उनकी पत्नी का देहांत हो गया. इसके बाद, रबीन्द्रनाथ ने पुनर्विवाह नहीं किया. 

शिलैडहा में बिताया समय

शिलैडहा के निवासियों ने उनकी कला को गम्भीर बनने में सहायता दी. वहां प्रौढ़ अवस्था में पहली बार साधारण लोगों से उनका मेल-जोल हुआ. वहां उनको जीवन का विविध और गम्भीर ज्ञान प्राप्त हुआ. उन्होंने अपनी कई उत्तम कहानियों की रचना इसी काल में की. उन्होंने ‘साधना’ नामक पत्रिका का आरम्भ भी इसी काल में किया जो कि लगभग 20 वर्ष तक प्रकाशित होती रही . आज भी यह अपने ढंग की सर्वोत्तम पत्रिका है. 

शिलैडहा कुटी गंगा और ब्रह्मपुत्र के संगम पर एक बहुत ही रमणीक स्थान है.  दूर-दूर तक जमीनें बिखरी हुई थीं. उनकी देख-भाल के लिए रबीन्द्र को नौका पर चढ़कर जाना पड़ता था, और उसमें उन्हें बड़ा आनन्द मिलता था. उन्होंने जमीनों का प्रबन्ध भली-भांति किया. खेती में नवीन साधनों का प्रयोग किया, किसानों की स्वच्छता और स्वास्थ्य की ओर ध्यान दिया, लगान माफ कर दिए और उनके बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल का प्रबन्धन किया. आप किसानों से मिलते जुलते रहते थे और उनके दुःख-सुख में सम्मिलित रहते थे. इस प्रकार वे उनके मित्र और पथ-प्रदर्शक बन गए.

शान्तिनिकेतन में रबीन्द्रनाथ
Rabindranath in Shantiniketan 

रटन्त विद्या के प्रति टैगोर के मन में अरुचि थी और इसी भावना से प्रेरित होकर उन्होंने 1901 में शांतिनिकेतन में एक स्कूल स्थापित  किया. पाठ भवन नाम के इस विद्यालय में उस वक्त सिर्फ पांच विद्यार्थी थे. आगे चलकर शांतिनिकेतन स्थित उनके इस स्कूल और विश्व भारती विश्वविद्यालय से सी.एफ. एंड्र्यूज, ई.जे. थॉम्पसन, इंदिरा गांधी और सिल्वन लेवी जैसी प्रसिद्ध शख्सियत जुड़ी रहीं. 

शांतिनिकेतन उन गिनी-चुनी भारतीय संस्थाओं में से एक है जिनमें प्राचीन भारतीय संस्कृति को वर्तमान आवश्यकताओं के अनुकूल बनाकर अपनी तरह की अभिनव शिक्षा प्रद्धति को आधारशिला बनाया गया है.

1902 में पत्नी के देहांत के साथ ही रबीन्द्रनाथ को चिंताओं ने आ घेरा. संसार अंधकारपूर्ण दिखाई देने लगा. वे अपने पुत्र और क्षय रोग यानी टीबी से पीड़ित पुत्री को लेकर एकान्त सेवन के लिए पहाड़ियों पर चले गए. वहां उन्होंने अपनी पत्नी की स्मृति में कई कविताएं लिखीं, जो ‘स्मरण’ में संकलित हैं. उसके पश्चात् ‘माली’, ‘चन्द्रकला’ और ‘गीतांजलि’ की रचना हुई.

रबीन्द्रनाथ टैगोर को नोबल
Nobel Prize to Rabindranath 

1912 में वे इंग्लैंड गए, जहां उनके गीत संग्रह गीतांजलि की 750 प्रतियां लंदन स्थित इंडिया सोसायटी से प्रकाशित हुईं. उनका यश उनसे पहले ही वहां पहुंच गया था. 1913 में मैकमिलन प्रकाशन ने इसे पुनः प्रकाशित किया और 16 नवम्बर 1913 को रबीन्द्रनाथ को शांति निकेतन में नोबल पुरस्कार के लिए चुने जाने का समाचार मिला.  जब उन्हें ‘गीतांजलि’ पर ‘नोबल पुरस्कार’ प्राप्त हुआ, तब पूरे संसार में उनकी महान साहित्यिक प्रतिभा को  अमिट पहचान मिली.

इसके बाद तो वे दुनिया के अनेक देशों में गए और विश्व के संभवतः ऐसे पहले साहित्यकार बने जिनकी कीर्ति एक से अधिक महाद्वीपों तक फैली थी.

Abdication of Knighthood by Tagore 

सर की उपाधि का परित्याग

1914 में  भारत की तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नाइटहुड प्रदान करते हुए ‘सर’ की उपाधि से सम्मानित किया, किन्तु 1919 में ‘जलियांवाला बाग’ में जब अंग्रेज सरकार द्वारा बर्वरतापूर्ण नर-संहार किया गया तो उन्होंने सरकार के अत्याचार की निन्दा करते हुए विरोध के रूप में ‘सर’ की उपाधि का परित्याग कर दिया.

रबीन्द्रनाथ टैगोर का निधन
Death of Rabindranath

रबीन्द्रनाथ ने भारतीय राष्ट्र निर्माण और समाज के उत्थान के लिए अनेक प्रयत्न किये. एक सच्चे समाज के लिए उन्होंने कहा था ‘जब तक हम स्त्रियों और वंचित वर्ग को साथ नहीं लेंगेगे तब तक हमारा विकास अधूरा रहेगा. कारण जब हम ऊंचे चढ़ेंगे, तब वे नीचे से पांव पकड़कर हमें भी नीचे की ओर खींच लेंगे. सशक्त के लिए अशक्त और निर्बल उसी प्रकार खतरनाक है, जिस प्रकार हाथी के लिए बालू. वे प्रगति में सहायक नहीं होते, क्योंकि वे विरोध नहीं करते; वे केवल पतन को नीचे उतार लाते हैं.’
स्वतन्त्रता के वे पूर्णतया समर्थक थे. उन्होंने आवश्यकता पड़ने पर ‘भारतीय-स्वतन्त्रता’ का खुल शब्दों में समर्थन किया था और विदेशियों की कड़ी-से-कड़ी आलोचना करने में नही चूके थे.
रबीन्द्रनाथ का व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली था. वे अपने लम्बे केश, लहराती हुई दाढ़ी और ऊंची-पतली काया के कारण प्राचीन भारत के ऋषियों के समान जान पड़ते थे. उनका स्वभाव धार्मिक, हृदय विशाल, और विचार उदार थे. उन्होंने उस प्राचीन भारतीय संस्कृति को पुनः जीवित कर दिखाया, जो लगभग मर चुकी थी. रबीन्द्रनाथ टैगोर ने 7 अगस्त, 1941 को कोलकाता में अंतिम सांस ली.

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