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अरुणाचलम मुरुगानंतम की जीवनी Biography of Arunachalam Muruganantham in Hindi

अरुणाचलम मुरुगानंतम सस्ते सैनेटरी नैपकीन Low Cost Sanitary Napkin बनाने वाली मशीन के आविष्कारक के रूप में जाने जाते हैं. साथ ही माहवारी स्वच्छता Menstrual Hygiene के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने के लिए भी प्रयासरत हैं.

ए. मुरुगानंतम की संक्षिप्त जीवनी Short Biography of A. Muruganantham

अरुणाचलम मुरुगानंतम सस्ते सैनेटरी नैपकीन Low Cost Sanitary Napkin बनाने वाली मशीन के आविष्कारक के रूप में जाने जाते हैं. भारत के तमिलनाडु प्रांत के कोयम्बटूर Koimbatore में जन्में अरुणाचलम ग्रामीण क्षेत्र और गरीब तबके की महिलाओं तक कम लागत के सैनेटरी पैड Low Cost Sanitary Pad पहुंचाने के लिए निरंतर काम कर रहे हैं. साथ ही माहवारी स्वच्छता Menstrual Hygiene के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने के लिए भी प्रयासरत हैं. इनके द्वारा तैयार की गई सैनेटरी पैड बनाने की मशीन भारत के अधिकतर राज्यों में लगाई गयी हैं ताकि उन महिलाओं तक सैनेटरी नैपकिन पहुंच सकें जो पैसे और जानकारी के अभाव में इनका उपयोग नहीं कर पाती हैं और माहवारी जनित बीमारियों का शिकार हो जाती हैं.

नामअरुणाचलम मुरुगानंतम
जन्म एवं स्थान1962, कोयम्बटूर
व्यवसायसोशल एंट्रप्रेन्यॉर
शिक्षाशिक्षा

अरुणाचलम मुरुगानंतम का प्रारम्भिक जीवन Early Life of Muruganantham

अरुणाचलम मुरुगानंतम का जन्म तमिलनाडु के कोयम्बटूर में वर्ष 1962 में एक गरीब बुनकर परिवार में हुआ था. इनके पिता एस. अरुणाचलम और माता ए. वनिता हथकरघा बुनकर Hand-loom Weaver थे. इनकी माता खेतों में मजदूरी का काम भी करती थी. अरुणाचलम का बचपन गरीबी में बीता और वह कक्षा 9 से आगे पढ़ाई नहीं कर पाए. 14 साल की उम्र में ही उन्हें स्कूल छोड़नी पड़ी. अपनी और परिवार की आजीविका के लिए उन्होंने खेतों में मजदूरी के अलावा मशीन टूल आपरेटर, वेल्डर और फैक्ट्रियों में काम करने वाले श्रमिकों को खाना सप्लाई करने जैसे काम भी किए.

मुरुगानंतम का करियर Career of Muruganantham

अरुणाचलम के सोशल एंट्रप्रेन्यॉर बनने की कहानी काफी प्रेरणादायी, रोचक और संघर्षपूर्ण है. अपनी शादी के बाद जब एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी को कुछ छुपाकर ले जाते हुए देखा तो उन्हें पता चला कि उनकी पत्नी शान्ति माहवारी के लिए गंदे कपड़ों और अखबार का उपयोग कर रही थी. अरुणाचलम ने जब इसके लिए सैनेटरी नैपकिन की बात कही तो शान्ति ने जवाब दिया कि सैनेटरी पैड काफी महंगे आते हैं. इस बात ने अरुणाचलम को काफी विचलित किया. वह सोचने लगे कि इस समस्या के हल के लिए कुछ करना चाहिए.

उन्होंने महसूस किया कि बाजार में मिलने वाले सैनेटरी पैड की कीमत Price of Sanitary Pad कच्चे माल की लागत से लगभग 40 गुना ज्यादा है. इसके बाद वह कोई ऐसा पैड बनाने के लिए प्रयोग करने लगे जो सस्ता और स्वच्छ हो. शुरुआत में उन्होंने रुई के पैड Cotton Pads बनाए और उपयोग के लिए अपनी पत्नी को दिए. पत्नी ने काम में लेने से मना किया तो उन्होंने अपनी बहन को पैड दिए मगर उनकी बहन ने भी इसके लिए मना कर दिया. उन्होंने स्थानीय मेडिकल कॉलेज की छात्राओं से भी अपने पैड की टेस्टिंग के लिए सम्पर्क किया मगर कोई तैयार नहीं हुआ. अब अरुणाचलम के सामने समस्या थी कि जो पैड उन्होंने बनाया है उसे कैसे परखा जाए कि वह उपयोगी है.

अरुणाचलम ने पहना पैड First Man to Wear Sanitary Pad

अरुणाचलम अपने आप को दुनिया का पहला व्यक्ति बताते हैं जिसने किसी कारण से सैनेटरी नैपकिन पैड पहना. The First Man who Wore Sanitary Pad. अपने बनाए रुई के पैड की टेस्टिंग के लिए उन्होंने स्वयं ही पैड पहना और नकली रक्त स्राव के लिए एक फुटबॉल ब्लेडर में जानवर का रक्त भरा ताकि यह पता चल सके कि उनका यह पैड रिसने वाले रक्त को कितना सोख पाता है. उन्होंने दौड़कर, चलकर, साइकिल चलाकर विभिन्न प्रकार से ब्लेडर से निकलने वाले रक्त को पैड द्वारा सोखे जाने की टेस्टिंग की.

मुरुगानंतम का पारिवारिक जीवन Family Life of Muruganantham

सस्ता सैनेटरी नैपकिन पैड बनाने का सपना अरुणाचलम के लिए तो पवित्र था लेकिन उनकी इस पावन भावना को लोग शुरुआत में समझ नहीं पाए. उनके कपड़ों से सड़ांध आने के कारण लोग उनसे दूर भागने लगे. लोगों ने उन्हें पागल करार दे दिया. अपनी पत्नी के लिए सस्ता और सुरक्षित पैड बनाने के लिए लगातार 18 महीने के प्रयास के बाद उनकी पत्नी ने उन्हें छोड़ दिया.

अरुणाचलम बताते हैं कि उनकी पत्नी ने उन्हें तलाक का नोटिस तक भिजवा दिया था. उनकी मां भी उन्हें छोड़ चुकी थी क्योंकि एक दिन मुरुगानंतम महिलाओं के काम में लिए हुए और खून से सने हुए सैनेटरी पैड घर लाकर अपने कमरे में पैड के मैटेरियल पर रिसर्च कर रहे थे. उनके गांव ने भी उनका बहिष्कार कर दिया. कुछ गांव वालों ने तो यहां तक कह दिया कि अरुणाचलम पर किसी बुरी आत्मा का साया है. आखिरकार उन्हें गांव छोड़ना पड़ा मगर उन्होंने सस्ता पैड बनाने का सपना नहीं छोड़ा और अपने प्रयास जारी रखे.

सैनेटरी नैपकिन की राह Finding the way to Low Cost Pad

अरुणाचलम को पता नहीं चल पा रहा था कि आखिर उनका रुई वाला पैड काम क्यों नही कर रहा था. तब एक कॉलेज प्रोफेसर ने उन्हें सैनेटरी नैपकिन बनाने वाली कम्पनियों के नम्बर दिए. बाद में उन्हें पता चला कि बाजार में मिलने वाले सैनेटरी नैपकिन मे साधारण रुई नहीं बल्कि एक पेड़ के तने से तैयार सेल्युलोज काम में आता है. उन्हें 2 साल और 3 महीने के बाद पूरी तरह पता चला कि आखिर सैनेटरी पैड बनता कैसे है.

अरुणाचलम के सामने नई समस्या यह थी कि इसे बनाने के लिए जो मशीन चाहिए उसकी कीमत लाखों में है. अब उनके सामने नयी चुनौती ऐसी मशीन तैयार करने की थी जिसकी लागत कम हो. फिर साढ़े चार साल के प्रयोगों के बाद अरुणाचलम ने आखिर कम लागत से सैनेटरी नैपकिन बनाने की मशीन तैयार कर ही ली. बिल गेट्स Bill Gates के साथ 2014 में ग्रांड चैलेंजेज एनुअल मीटिंग ‘Grand Challenges Annual Meeting 2014’ में मुरुगानंतम ने बताया कि इस काम में उन्होंने किसी की भी आर्थिक मदद नहीं ली. कई बार तो आने—जाने के किराए के लिए उन्होंने अपना खून तक भी बेचा.

इनोवेशन अवार्ड Innovation Award to Muruganantham

कम लागत में सैनेटरी पैड बनाने वाली लकड़ी की बनी इस मशीन को जब आईआईटी मद्रास IIT Madras के वैज्ञानिकों ने देखा तो इस मशीन को नेशनल इनोवेशन अवार्ड की प्रतियोगिता ‘बेस्ट इनोवेशन फॉर दी बेटरमेंट आफ सोसायटी’ Best Innovation for the Betterment of Society में प्रदर्शित किया गया. यह मॉडल 943 प्रविष्टियों में पहले स्थान पर रहा और भारत की तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल Pratibha Patil ने अरुणाचलम मुरुगानंतम को नेशनल इनोवेशन अवार्ड National Innovation Award से सम्मानित किया. अवार्ड मिलते ही अरुणाचलम देशभर में चर्चा में आ गए और करीब साढ़े पांच साल बाद उनकी पत्नी शान्ति ने उन्हें पहला फोन कॉल किया.

अरुणाचलम बने सोशल एंट्रप्रेन्यॉर Arunachalam: A Social Entrepreneur

अरुणाचलम के पास सात साल की री—इंजीनियरिंग Re-Engineering के बाद अब सस्ते और सुरक्षित Low-cost and Safe सैनेटरी नैपकिन बनाने वाली एक ऐसी मशीन थी जिसकी कीमत इम्पोर्टेड मशीन की कीमत 3 करोड़ 20 लाख रुपए की तुलना में 61 हजार रुपए से भी कम थी. अरुणाचलम ने कम लागत की इस मशीन के उत्पादन के लिए जयश्री इंडस्ट्रीज Jayaashree Industries की स्थापना की और डेढ़ साल के भीतर 250 मशीनें बना डाली. इस मशीन से बनने वाले एक पैड की कीमत मात्र 2.5 रुपए होती है. बिहार और भारत के तमाम राज्यों में इस मशीन को पहुंचाने के बाद अरुणाचलम अब कीनिया, नाइजीरिया, बांग्लादेश, मॉरीशस और फिलीपींस जैसे देशों के ग्रामीण इलाकों में भी पहुंचाने के प्रयास में जुटे हुए हैं.

आज कई देश मुरुगानंतम की यह मशीन आयात करते हैं. मुरुगानंतम ने अपनी इस मशीन की जानकारी जयश्री इंडस्ट्रीज की वेबसाइट newinventions.in पर डाल रखी है. अरुणाचलम चाहते तो इस मशीन के पेटेंट से करोड़ों रुपए कमा सकते थे मगर वह कहते हैं— ‘ग्रामीण भारत में केवल 7 प्रतिशत महिलाएं माहवारी के समय सैनेटरी पैड काम में लेती हैं. मैं चाहता हूं कि मेरे जीते जी 100 प्रतिशत महिलाएं सैनेटरी पैड काम में लें. इसके साथ ही मैं भारत में इस काम के लिए 10 लाख और दुनियाभर में एक करोड़ महिलाओं को रोजगार देना चाहता हूं.’

गेस्ट लेक्चरर के रूप में As Guest Faculty

सोशल एंटरप्रेन्यॉर के रूप में स्थापित अरुणाचलम अपनी इस उपलब्धि के बाद देश के कई उत्कृष्ट संस्थानों के गेस्ट लेक्चरर Guest Lecturer बने. उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद IIM Ahmedabad, आईआईएम बैंगलोर IIM Bangalore और आईआईटी बॉम्बे IIT Bombay जैसे संस्थानों में अपनी उपलब्धि पर लेक्चर दिए. न सिर्फ इतना ही बल्कि 2014 में हार्वर्ड विश्वविद्यालय Harvard University की इंडिया कॉन्फ्रेंस India Conference में भी अरुणाचलम अपनी कहानी साझा करने के लिए स्पीकर के रूप में शामिल हुए. वह 2011 में जयपुर में आयोजित इंक कॉन्फ्रेंस के वक्ताओं में शामिल हुए. टेड की प्रतिष्ठित टेड टॉक्स में भी उन्होंने स्पीच दी.

अरुणाचलम मुरुगानंतम पर बनी फिल्म Padman Movie Based on Arunachalam

अरुणाचलम की कहानी पर बॉलीवुड Bollywood में एक बड़ी फिल्म पैडमैन भी बनी है जिसमें बॉलीवुड सुपरस्टार अक्षय कुमार Akshay Kumar ने उनका और राधिका आप्टे ने उनकी पत्नी शान्ति (Radhika Apte as Muruganantham’s Wife) का किरदार निभाया है. यह फिल्म आर. बालकी के निर्देशन में अक्षय कुमार की पत्नी ट्विंकल खन्ना ने बनायी है.

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