स्वामी विवेकानंद की जीवनी Swami Vivekanand Biography in Hindi

स्वामी विवेकानंद की जीवनी Swami Vivekanand Biography in Hindi

स्वामी विवेकानंद ने भारतीय चिंतन परम्परा में एक नया आयाम जोड़ा. उन्होंने इस सनातन संस्कृति के विचारों और दर्शन को पश्चिमी जगत के सामने रखा और भारतीय मनीषा के लेकर उनके पूर्वाग्रह को तोड़ने का काम सफलतापूर्वक किया. भारत के युवाओं को राह दिखाई और आध्यात्मिक विकास के साथ ही भौतिक विकास की जरूरतों को देश के सामने रखा. अपने अल्पकालीन जीवन में उन्होंने इतने महान कार्य किये कि भारत आज तक उनका आंकलन कर रहा है.

नाम
स्वामी विवेकानंद
जन्म
12 जनवरी, 1863 कलकता
प्रमुख कृतियां
वर्तमान भारत, परिव्राजक, मातवार कथा, प्राच्य और पाश्चात्य
गुरूरामकृष्ण परमहंस
मृत्यु5 जुलाई, 1902, बैलूर मठ

स्वामी विवेकानंद का आरंभिक जीवन

स्वामी विवेकानंद जिनका सांसारिक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था का जन्म 12 जनवरी, 1863 को कलकता में श्री विष्वनाथदत्त के घर में हुआ. उनकी माता भुवनेष्वरी देवी बड़ी धर्म-परायण महिला थी. श्री विष्वनाथ एक समृद्धिशाली तथा उदार-हृदय व्यक्ति थे. अतः सुख ऐश्वर्य के आनन्दप्रद वातावरण में विवेकानन्द का पालन-पोषण होने लगा.

बचपन से ही नरेन्द्र बड़े प्रतिभाशाली थे. बाल्यकाल से ही उन्होंने अपनी विलक्षण स्मृति और मेधा का परिचय देना आरंभ कर दिया था. बालक नरेन्द्र पर अपनी माता का बहुत प्रभाव था. माता के मुख से रामायण और महाभारत की कथाएं सुनकर बाल्यावस्था में ही नरेन्द्र पहले सीताराम और बाद में शिव के परम भक्त बन गये थे.

साधुओं के दर्शन से वे बड़े प्रसन्न होते थे. उन्हें दान देने में तथा उनके उपदेश सुनने में उन्हें बड़ा आनन्द आता था. कभी-कभी माता से कहते-‘मां अगर मैं साधु हो जाऊं, तो मुझे शिव भगवान् के दर्शन हो जायेंगे ?’ मां उनके मृदु स्वर से ऐसी बात सुनकर गद्गद् हो कण्ठ से लगा लेती. माता क्या जानती थी कि यही नरेन्द्र एक दिन संन्यासी होकर संसार का एक महान् मानव बनेगा.

5 वर्ष की अवस्था में घर पर नरेन्द्र की शिक्षा प्रारम्भ हुई. प्राथमिक शिक्षा समाप्त होने पर नरेन्द्र मेट्रोपोलिटन इन्सिटटयूशन’ में भेज दिये गए. यहां अपने समवयस्क सहपाठियों का साथ पाकर उनके आनन्द की सीमा न रही. नरेन्द्र पढ़ते-लिखते कम थे, खेलते-कूदते अधिक थे. फिर भी वे जो कुछ पढ़ते थे, उस पर गम्भीर विचार करते थे. तर्क-वितर्क करने में वे आरम्भ से ही निपुण थे.

दूसरों से सुनकर किसी भी बात पर विश्वास कर लेना नरेन्द्र के स्वभाव के विरूद्ध था. बचपन से ही किसी बात पर प्रत्यक्ष प्रमाण के बिना वे विश्वास करना नहीं जानते थे. युवावस्था में इसी भाव की प्रेरणा से नरेन्द्रनाथ पुस्तक में लिखे दार्शनिक तत्त्व की आलोचना से तृप्त न होकर सत्य की प्राप्ति के लिए साधना में प्रवृत्त हुए थे.

चौहद वर्ष की आयु में नरेन्द्र के पेट में रोट हुआ. निरन्तर कई दिनों तक बीमार रहने के बाद उन्हें इलाज के लिये अपने पिता के पास रायपुर भेज दिया गया. 1877 ई० में नरेन्द्र रायपुर में पिताजी के पास पहुंच गए. रायपुर में उस समय स्कूल नहीं था. अतएव विश्वनाथ पुत्र को स्वयं शिक्षा देने लगे. पाठय-पुस्तकों के अतिरिक्त इतिहास, दर्षन तथा साहितय-सम्बन्धी अनेक पुस्तकों के पुत्र को पढ़ाने लगे.

नरेन्द्र ने दो वर्ष तक पिता के पास रहकर केवल ज्ञान-लाभ ही नहीं किया, बल्कि उनके किशोर चरित्र पर पिता की महानता की गम्भीर प्रभाव भी पड़ा. तेजस्विता, दूसरों को दुःख देखकर दुखी होना, विपति में धैर्य को न छोड़ते हुए अपना कर्तव्य करना नरेन्द्र ने अपने पिता से ही सीखा था.

दो वर्ष तक रायपुर में रहने के पश्चात् नरेन्द्र सोलह वर्ष की आयु में कलकत्ता लौट आए. कलकत्ता में आकर वे पुनः ‘मेट्रोपोलिटन इन्स्टिटयूशन’ की प्रवेशिका श्रेणी में भर्ती हुए. निरन्तर दो वर्ष तक गैरहाजिर रहने पर भी उन्होंने कड़े परिश्रम द्वारा दो वर्ष की शिक्षा एक ही वर्ष में समाप्त कर ली और परीक्षा में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए. उनकी इस सफलता पर परिवार वालों के साथ-साथ स्कूल के अधिकारियों को भी प्रसन्नता हुई.

नरेन्द्र नाथ की कॉलेज शिक्षा

सन् 1879 ई० में प्रवेशिका परीक्षा में उत्तीर्ण होकर नरेन्द्रनाथ ने काॅलेज की शिक्षा प्राप्त की. इस समय उन्होंने दर्षन-शास्त्र का गम्भीर अध्ययन किया. पाश्चात्य विज्ञान तथा दर्षन-शास्त्र का भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया. ह्यूम व बेन की नास्तिकता, डार्विन का विकासवाद और स्पेन्सर का अज्ञेयवाद इत्यादि विभिन्न दार्षनिकों की विचाधाराओं में बहते हुए नरेन्द्रनाथ सत्य की प्राप्ति के लिए व्याकुल हो उठे.

स्वामी विवेकानन्द से रामकृष्ण परमहंस की भेंट

नरेन्द्रनाथ दत्त को स्वामी विवेकानंद बनाने का श्रेय पूरी तरह रामकृष्ण परमहंस को जाता है. उनके दिखाये मार्ग पर चलकर ही नरेन्द्र को वह ज्ञान मिला जिससे उन्होंने पूरी दुनिया को चमत्कृत कर दिया.
1880 के नवम्बर में नरेन्द्रनाथ का परिचय श्री रामकृष्ण परमहंस से हुआ. नरेन्द्र को देखते ही परमहंस जी जान गए कि यह असाधारण युवक एक दिन संसार का महान् व्यक्ति बनेगा और सच्चे ज्ञान का प्रसार करके मानव-जाति का कल्याण करेगा.

नरेन्द्र भी स्वामी जी के अलौकिक व्यक्तित्व, प्रेमपूर्ण व्यवहार तथा सदुपदेषों से प्रभावित हुए. उन्होंने दक्षिणेश्वर में परमहंस जी के पास आना-जाना आरम्भ कर दिया. परमहंस जी भी बड़ी श्रद्धा तथा प्रेम के साथ अपना उत्तराधिकारी तैयार करने लगे. नरेन्द्र की यह दशा देखकर उनके पिता ने उन्हें विवाह-बन्धन में बांधने की भरपूर चेष्टा की, किन्तु नरेन्द्र ने विवाह करने से साफ इन्कार कर दिया. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया-‘ईष्वर-प्राप्ति ही मेरे जीवन का उद्देश्य है, मैं इसकी प्राप्ति के लिए प्राणों तक की आहुति दे दूंगा.’

प्रारम्भ में तो नरेन्द्र के मन में श्री रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों एवं सिद्धान्त के प्रति अनेक भ्रम एवं शंकायें उठती रहीं, अन्त में वे पूर्ण रूप से उनके अनुयायी बन गए और दर्शन-शास्त्र तथा वेदान्त आदि का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करके अनवरत साधना में लीन हो गए. यद्यपि उनके मार्ग में अनेक पारिवारिक एवं सामाजिक बाधाएं उपस्थित हुई तथापि वे अपनी साधना से विचलित न हुए. अन्त में पिता की मृत्यु से तो उनके जीवन में महान् परिवर्तन हो गया.

सन् 1886 ई० को श्री रामकृष्ण परमहंस नरेन्द्र को संन्यास ग्रहण कराकर, अपना अपार ज्ञान उन्हें देकर पर लोक सिधार गए. नरेन्द्र अब स्वामी विवेकानन्द के नाम से प्रख्यात हो गए. उन्होंने ‘रामकृष्ण मिशन’ की स्थापना करके अपने गुरूजी के सिद्धान्तों का प्रचार करना प्रारम कर दिया. कुछ ही दिनों में समस्त देश में उनकी ख्याति फैल गई. स्वामी विवेकानन्द ने देश के समस्त तीर्थों एवं बड़े-बड़े नगरों का भ्रमण करके धर्म का प्रचार किया.

वे अद्धैतवादी थे. उनके उपदेशों ने नास्तिकों को आस्तिक बनाया, पथ-भ्रष्टो को मार्ग दिखाया और धर्म-च्युत समाज में एक बार पुनः धार्मिकता, आध्यात्मिकता तथा दार्शनिकता के सुविचार मार्ग को ग्रहण किया. उन्होंने भारतीय समाज का राह उस समय प्रशस्त किया जब भारत की आजादी की लड़ाई के सुगबुगाहट शुरू हो रही थी और लोगों को राजनीतिक के साथ एक धार्मिक नेतृत्व की जरूरत महसूस हो रही थी.

स्वामी विवेकानन्द का शिकागो भाषण

स्वामी विवेकानन्द के जीवन में एक बड़ा अध्याय तब जुड़ा जब उन्होंने शिकागो में आयोजित धर्म सम्मेलन में अपने भाषण से पूरे अमेरिका का दिल जीत लिया. सन् 1893 ई० में संयुक्त राष्ट्र अमरीका में शिकागो सम्मेलन के साथ-साथ एक धर्म-सभा का आयोजन हुआ. ऐसा घोषित किया गया कि संसार के सभी धर्मो के प्रतिनिधिगण उसमें सम्मिलित होंगे.

स्वामी जी के शिष्यों ने उन्हें धर्म के प्रतिनिधि के रूप में अमरीका भेजने का निश्चय किया. अन्त में खेतड़ी महाराज के प्रबन्ध से स्वामी जी ने, हिन्दू धर्म के सम्बन्ध में विदेशियों के भ्रमपूर्ण विश्वासों को दूर करके उसके उदार भावों का अधुनिक वैज्ञानिक युक्तियों द्वारा प्रचार करने के लिए, पाश्चात्य जड़वाद का मंथन के लिए 31 मई, 1893 को भारत से ‘शिकागो की ओर’ प्रस्थान किया.

शिकागो में स्वामी जी के प्रथम व्याख्यान ने पाश्चात्य विद्वानों की आंखे खोल दी. इसके पश्चात् तो उनके व्याख्यानों की झड़ी-सी लग गई. असंख्य अमरीकन जन-समूह बड़े उत्साहपूर्वक उनकें उपदेश सुनने के लिए उमड़ पड़ता था. अमरीका के विभिन्न बड़े-बड़े नगरों में उनके व्याख्यान हुए. अमरीकन पत्र-पत्रिकाओं ने बड़े गौरव के साथ उनकी प्रशंसा एवं व्याख्यान प्रकाषित किए.

अमरीका निवासियों ने प्रथम बार हिन्दू-धर्म के ज्योतिर्मय ज्ञान का दर्शन स्वामी विवेकानन्द से किया. बड़े-बड़े नगरों में उनके चित्र लटकाये गए. बहुत से युवक उनके अनुयायी बनकर उनसे दर्शन-शास्त्र की शिक्षा प्राप्त करने लगे. वे जहां भी जाते थे, जनता की भीड़ उमड़ पड़ती थी और लौग उनकी प्रत्येक बात सुनने के लिए आग्रह करते थे. महासभा के बाद से ही वे संयुक्त राष्ट्र के प्रधान-प्रधान नगरों में विराट जन-समूह के समक्ष भाषण दे रहे हैं और सभी स्थानों पर वे विषेष रूप से आमन्त्रित हो रहे हैं.

अमरीका के पश्चात् स्वामी जी को इंग्लैंड में आमन्त्रित किया गया. वहां भी इनके व्याख्यानों ने लोगों को प्रभावित किया. इंगलैंड के सभी प्रमुख नगरों में स्वामी जी के व्याख्यान हुए. वहां भी इन्हें अपूर्व आदर व सम्मान प्राप्त हुआ. इस प्रकार निरन्तर चार वर्ष तक स्वामी जी ने पाश्चात्य देशों को अपने वाणी-अमृत से प्रकाशित किया.

स्वामी विवेकानंद का भारत पर प्रभाव

स्वामी विवेकानंद के विरोधियों ने उनकी बुराई करना और भिन्न माध्यमों से घृणित प्रचार भी किया. किन्तु उससे उनके कार्य और सम्मान में कुछ भी अन्तर नहीं पड़ा. चार वर्षो तक प​श्चिमी देशों का भ्रमण करने के पश्चात् स्वामी विवेकानन्द भारत लौटे. भारतीय समुद्र-तट पर उतरते ही भारतवर्ष की जनता ने उनका भव्य स्वागत किया. स्थान-स्थान पर उनके सम्मानाथ सभाएं करके उन्हे अभिनन्दन-पत्र भेंट किए गए.

इसके पश्चात् उन्होंने भारत के गांव-गांव और नगर-नगर में भ्रमण करके जन-साधारण की सामाजिक व आर्थिक अवस्था का गम्भीर सहानुभूति के साथ निरीक्षण किया. स्वामी विवेकानन्द ने साहित्य की भी उल्लेखनीय सेवा की है. उनके द्वारा लिखित ‘वर्तमान भारत’, ‘परिव्राजक’, ‘मातवार कथा’ (सोचने योग्य बात), प्राच्य और पाश्चात्य आदि गन्थों ने जहां देश के सामाजिक तथा नैतिक जीवन में नव-चेतना का मंत्र फूंका, वहां उन्होंने साहित्य के भण्डार की भी अभिवृद्धि की है.

स्वामी विवेकानंद की मृत्यु

1901 ई० स्वामी जी को रोग ने आ घेरा। उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा. किन्तु इस काल में भी वे प्रचार-कार्य बराबर करते रहे. पर्याप्त चिकित्सा करने पर भी स्वास्थ्य में कोई सुधार न हुआ. अन्त में 5 जुलाई, 1902 को अमावस्या की रात्रि को बैलूर मठ में उनका शरीरान्त हो गया. देश-भर में शोक की लहर दौड़ गई.

उनकी मृत्यु के पश्चात भी उनके शिष्यों ने रामकृष्ण मिशन को यथावत जारी रखा और आज तक रामकृष्ण मिशन हिन्दू धर्म के दर्शन को पूरी दुनिया में प्रसारित करने का काम कर रहा है। आजाद भारत की सरकार ने उनके जन्म दिवस को युवा दिवस के तौर पर मनाने का संकल्प लिया और उनका उद्घोष वाक्य— उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक मत रूको। युवाओं का ध्येय वाक्य बन गया.

यह भी पढ़ें:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *