दयानन्द सरस्वती की जीवनी- dayanand Saraswati Biography hindi

दयानन्द सरस्वती की जीवनी- Dayanand Saraswati Biography hindi

दयानन्द सरस्वती आने समय क सबसे बड़े सुधारको में थे. उनका प्रादुर्भाव ऐसे समय में हुआ जब हिन्दू-समाज नैतिक-परतंत्रता तथा सामाजिक बंधनों के भार से दबा हुआ था. देश में ऐसे अनगिनत मत-मतांतरों एवं सम्प्रदायों का जन्म हो चुका था, जो आपस में लड़ते रहते थे. इस दशा को देखकर स्वामी दयानंद सरस्वती ने हिंदू धर्म को नई राह दिखाने का काम अपने हाथों में लिया.

नाम दयानंद सरस्वती, मूलशंकर
जन्म12 फरवरी, 1824 टंकारा, मौरवी
प्रमुख कार्य वेद अध्ययन और आर्य समाज
मृत्यु30 अक्टूबर 1883

स्वामी दयानन्द सरस्वती का प्रारंभिक जीवन

दयानन्द सरस्वती का जन्म संवत् 1881 यानी 12 फरवरी, 1824 में मौरवी राज्य के टंकारा नाम ग्राम में हुआ था. उसके पिता कृष्ण जी औदीच्य ब्राह्मण थे और लेन-देन का कार्य करते थे. दयानन्द का बचपन का नाम मूलशंकर था.

5 वर्ष की अवस्था से ही मूलशंकर को देवनागरी पढ़ाई गई और बहुत से मंत्र तथा श्लोक कंठस्थ करा दिये गए. आठ वर्ष अवस्था में आपका यज्ञोपवीत-संस्कार हो गया. आपके पिता कृष्ण जी शैव मत के अनुयायी थे और शिव की पूजा बड़ी निष्ठा से किया करते थे. मूलशंकर भी पिता के इन कार्यो में उनके साथ रहते थे.

मूलशंकर से दयानंद सरस्वती बनने की राह

माघ बदी चतुर्दशी संवत 1894 को शिवरात्री का व्रत आया और पिता के साथ मूलशंकर ने भी बड़ी श्रद्धा के साथ उपवास रखा. रात्रि को शिव-मन्दिर में जागरण हुआ. मूल जी भी उसमें सम्मिलित थे. आधी रात्रि का समय हुआ तो पुजारी तथा उपासक सभी ऊँघने लगे, मूलशंकर को नीद कहाँ? वे शिव की अनन्य पूजा में रत थे. उसी समय उन्होंने ऐसी घटना देखी जिसने उनके हृदय में क्रांतिकारी विचारों का तूफान खड़ा कर दिया.

शिव भगवान् की मूर्ति के पीछे से कुछ चूहे निकले और भोग खाने के लिये मूर्ति पर चढ़ बैठे. बालक मूलशंकर अवाक् रह गया. त्रिलोकी का स्वामी चूहों से मात खा रहा है? क्या मेरा देवता इतना निर्बल है? मूलशंकर के हृदय में इन्ही विचारों का बवंडर उठ खड़ा हुआ. वास्तविक शिव कोई दूसरा ही है. मैं उसकी खोज करूंगा. ऐसा उन्होंने मन-ही-मन निश्चय किया. मूलशंकर की अवस्था अब चौदह वर्ष की थी.

इसी समय दो ऐसी घटनाएं उनके सम्मुख हुई, जिन्होंने उनके जीवन की धारा को पलट दिया. उनकी बहन को हैजा हो गया. बहुत उपचार करने पर भी वह न बची और उसकी मृत्यु हो गई. उनके सामने उनके परिवार में यह प्रथम मृत्यु थी.

उन्होंने सोचा-‘मुझे भी एक दिन इसी प्रकार मरना है-सबको मरना है-मैं ऐसी औषधि की खोज करूंगा, जो मुझे मृत्यु से बचा ले’ अगले वर्ष उसी व्याधि से उसके चाचा की मृत्यु हो गई मूलशंकर ने उन्हें भी जाते देखा. इस समय अवस्था 19 वर्ष की थी. उन्होंने विलम्ब करना उचित न समझा और मृत्यु से बचने की औषधि खोजने के लिए घर छोड़ने का निश्चय कर लिया.

उधर उनके पिता उनके विवाह की तैयारिया में संलग्न थे. एक उत्तम कुल में सुन्दर लड़की खोजी गई, लेकिन मूलशंकर ने विवाह न करने का मानस बना लिया. वे विवाह के बन्धन से बचकर कहीं दूर भाग जाना चाहते थे. सवंत 1902 में 22 वर्ष का मूलशंकर एक रात चुपचाप घर से निकल गया. वधू के स्थान पर वे मृत्यु से बचने वाले सच्चे योगी गुरू की खोज में लगे थे.

घर से निकलकर वे किसी योगी गुरू की खोज में इधर-उधर भटकने लगे. इसी बीच पिता ने उन्हें एक बार खोजकर पकड़वा कर घर मंगाया, किन्तु वे पुनः घर से निकल गए और अहमदाबाद होते हुए बड़ौदा जा पहुंचे. वहां वे एक मठ में जाकर अद्धैतवाद के अनुयायी बन गए. यहां इनका नाम ‘शुद्ध चैतन्य’ रखा गया. शुद्ध चैतन्य को वह वस्तु वहां नहीं मिली, जिसकी खोज में वे निकले थे इसलिये वे अपनी यात्रा में आगे बढ़े और नर्मदा के किनार चारगोद नामक स्थान पर जा पहुंचे.

दयानन्द सरस्वती का जन्म

दयानन्द सरस्वती को अभी अभीष्ट गुरू नहीं मिल पाया था, वे पुनः अहमदाबाद लौटे और वहां के दुग्धेश्वर मन्दिर से शिवानन्द गिरी और ज्वालानन्द पुरी नाम के योगियों से योग-विद्या सीखी. किन्तु उनके निर्दिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति अभी नहीं हुई थी. वहां से चलकर वे नर्मदा तट, आबू पर्वत और अन्य स्थानों में घूमते-फिरते संवत् 1922 में हद्विर आये.

वहां चंडी के वन में तपस्या की. पुनः ऋषीकेष होते हुए बद्रीनारायण पहुंचे; किन्तु उन्हें उस प्रदेश में भी कोई सच्चा गुरू न मिल पाया. अन्त में वे निरन्तर तीन वर्ष तक जंगलों और पहाड़ों मे दारूण कष्ट झेलते हुए संवत् 1912 में स्वामी विरजानन्द जी की सेवा में मथुरा जा पहुंचे. स्वामी विरजानन्द प्रज्ञाचक्षु थे और उनके अगध पाण्डितय की चारों और धूम थी. दयानन्द ने इन्ही को अपना गुरू बनाकर उनसे सब शास्त्र पढ़े. उस समय दयानन्द की अवस्था 35 वर्ष के लगभग थी.

दयानंद सरस्वती और वेद अध्ययन

लगभग 2 वर्ष तक दयानन्द सरस्वती वेद-शास्त्रों का अध्ययन करते रहे. पढ़ाई समाप्त होने पर दयानन्द ने गुरू से भ्रमण करने की आज्ञा मांगी. गुरू का आशीर्वाद साथ लेकर समी दयानन्द कल्याण-यात्रा को चल दिए.

अपनी इस यात्रा में वे देश के शहरों का भ्रमण करते, वेदों का प्रचवन सुनाते, गो-वध बन्द कराने का प्रयत्न करते हुए फाल्गुण सु० 7 सवंत 1923 को हरिद्वार कुम्भ के मेले में पधारे और वहां के अमित जनसमुदाय के मध्य अपनी ‘पाखंड-खंडिनी पताका’ गाड़कर बैठ गए. यहां उन्होंने व्याख्यानों और शास्त्रार्थो की वह अटूट धारा बहाई, जिसने जनता के भ्रम को धो डाला और उन्हें एक बार फिर वेदों का अमर संदेश दिया.

काशी के पंडितों से शास्त्रार्थ और सत्यार्थ प्रकाश

मेले के पश्चात् कर्णवास, अनूप शहर, फर्रूखाबाद, कानपुर आदि नगरों का पर्यटन करते तथा वैदिक धर्म की पताका फहराते हुए संवत 1926 में वे काशी पहुंचे. वहां उन्होंने 28 ख्याति-प्राप्त पण्डितों से शास्त्रार्थ करके उन्हें परास्त किया, और अठारह पुराण, मूर्ति-पूजा, शैव, शक्ति, तंत्र-गन्थ, मदिरा, व्यभिचार, चोरी और छल-कपट आदि की धज्जियां उड़ाते हुए अपने वास्तविक सुधारक रूप का जनता को परिचय दिया.

12 जून सन् 1874 को ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रचना आरम्भ की, जिसकी प्रथम प्रति 1875 में प्रकाशित हुई. वहां से वे प्रयाग, जबलपुर, नासिक, पंचवटी आदि होते हुए बम्बई आये और वहां वैदिक धम का प्रचार किया.

दयानंद सरस्वती और आर्य समाज की स्थापना

31 दिसम्बर, 1874 को स्वामी जी ने राजकोट में प्रथम ‘आर्यसमाज’ स्थापित किया और उसके 10 नियम बनाये. 18 जनवरी, 1875 को अहमदाबाद आकर आर्यसमाज की स्थापना की और 10 अप्रेल, 1875 को बम्बई में आर्यसमाज की स्थापना कर समाज के 28 वैधानिक नियम बनाये.

जनवरी 1877 में लार्ड लिटन ने दिल्ली में एक बड़ा दरबार किया, जिसमें स्वामी जी को आमन्त्रित किया गया. वहां बाबू केशवचन्द्र सेन, नवीचन्द्र राय तथा मुन्शी कन्हैयालाल आदि दूसरे सुधारकों को विचार-विनिमय किया. वहां से चांदापुर मेले में शास्त्रार्थ करते हुए 21 मार्च, 1788 को लुधियाना और 19 अप्रेल को लाहौर गए. 24 जून को लाहौर में आर्यसमाज की स्थापना की और 22 अगस्त, 1878 को अमृतसर में आर्यसमाज बनाया.

इस प्रकार देश में फैले पाखण्ड तथा अविद्या के अंधकार को दूर करके स्वामी जी ने सर्वत्र वैदिक धर्म का प्रकाश फैला दिया. 1883 को आप अजमेर गए और वहां उपदेश देकर जोधपुर पहुंच गए. जोधपुर के महाराज यशवन्त सिंह ने आपका स्वागत किया और महाराजा के विशाल आंगन में ही स्वामी जी ने व्याख्यानों की धूम मचा दी और नगर की जनता को सद्धर्म के दर्शन कराये.

दयानन्द सरस्वती की हत्या का षड़यंत्र

महाराज जोधपुर स्वामी जी के परम भक्त थे. स्वामी जी उनके महल में भी उपदेशार्थ जाते थे. एक दिन स्वामी जी जब महाराज से मिलने गए तब वहां उनकी नन्हीजान भी उपस्थित थी. महाराज ने उसे छिपाने का भी प्रयत्न, किया, किन्तु स्वामी जी ने उसे देख ही लिया. बस फिर क्या था-उन्होंने महाराज को फटकारा. इससे जहां महाराणा को लज्जा और अनुताप हुआ, वहां मुन्नीजान क्रोध में पागल हो गई और उसने स्वामी जी के प्राण लेने की ठान ली.

25 सितम्बर की रात्रि को दैनिक कार्यो से निश्चिन्त होकर स्वामी जी दूध पीकर सो गए, किन्तु पेट में दर्द हुआ और तीन उल्टियां हुई. दर्द बढ़ गया. प्रातःकाल उठने पर फिर वमन हुआ और दस्त आरम्भ हो गए. स्वामी जी को संदेह हो गया कि किसी ने विष दे दिया है. उन्होंने नेती-धोती आदि अनेक यौगिक उपचार किये, किन्तु जहां पहले कई बार वे खाए विष का उपचार करने में सफल हुए थे, अब की बार न हुए.

15 अक्टूबर को रोग अधिक बढ़ जाने पर आबू गए, वहां भी शांति नहीं मिली. 23 अक्टूबर को अजमेर आ गए. कई डॉक्टरो का उपचार हुआ, किन्तु लाभ न हुआ. अन्त में 30 अक्टूबर 1883 को दीपमालिका के दिन संध्या के 6 बजे स्वामी जी प्रसन्न मुख होकर सबको आशीर्वाद देते हुए ‘ईश्वर तेरी इच्छा पूर्ण हो’ कहकर इस संसार से विदा हो गए.

भारत पर स्वामी जी के महान् ऋण हैं. अपने छोटे-से जीवन में उन्होंने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक फैले हुए ‘पाखण्ड एवं कुप्रथाओं’ को दूर करके ‘वैदिक धर्म’ का नाद बजाया. ‘गो-वध’ बंद कराने का प्रयत्न किया. ‘बाल-विवाह’ की प्रथा का विरोध लोगो को ‘ब्रह्मचर्य’ का महत्व बताया. स्थान-स्थान पर ‘गुरूकुल’ खुलवाकर उनमें ‘संस्कृत शिक्षा’ के साथ-साथ ब्रह्मचर्य-पालन पर बल दिया. ‘विधवा-विवाह’ की प्रतिष्ठा की और ‘मद्य-मांसादि का घोर विरोध’ किया.

स्त्रियों को ‘स्वतन्त्रता’ दिलाई, ‘राजनीतिक स्वतन्त्रता’ पर बल दिया और हर प्रका से आर्य जाति को फिर से उसके अतीत गौरव पर स्थापित करने का प्रयात्न किया.

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