कार्ल मार्क्स की जीवनी Karl Marx Biography in Hindi

कार्ल मार्क्स की जीवनी Karl Marx Biography in Hindi

कार्ल मार्क्स दुनिया के उन थोड़े से विचारको में से हैं, जिन्होंने लोगों के जीवन की दिशा ही बदल दी. उनेक पूंजीवाद के खिलाफ दिये गये विचारों ने दुनियाभर में साम्यवाद की नींव रखी और आज भी उनके विचारों को शाश्वत मानने और उनकी लड़ाई लड़ने वाले दुनियाभर में मौजूद है. कार्ल मार्क्स ने अपने जीवन में जिन भी ​विचारों का प्रादुर्भाव किया, उसके प्रभाव में आकर पूरे मुल्क ने अपनी आधारभूत संरचनाओं और वैचारिक धारा को बदलने का काम किया.

नाम कार्ल मार्क्स
जन्म 5 मई, 1818 राइमलैंड, जर्मनी
प्रमुख पुस्तकेकम्युनिस्ट मैनिफस्टो, कैपिटल तथा पेरिस कम्यून
मृत्यु 14 मार्च 1853, लन्दन

कार्ल मार्क्स का आरंभिक जीवन

कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई, 1818 को जर्मनी के राइमलैंड में हुआ था. उनके पिता एक यहूदी वकील थे. जिस समय कार्ल मार्क्स 6 वर्ष के थे उनका सारा परिवार ईसाई धर्म में दीक्षित हो गया. हालांकि इस धर्म परिवर्त्तन का कोई भी प्रभाव कार्ल मार्कस् के व्यक्तित्व के विकास पर नहीं पड़ा. बाल्यकाल से ही इनमें कुछ ऐसे लक्षण देखे जाने लगे जिनसे इनके स्वाधीन चेतना तथा विचारशील होने का आभास मिलने लगा.

कार्ल मार्क्स और जेनी का प्रेम

17 वर्ष की अवस्था में कार्ल विश्वविद्यालय में कानून के विद्यार्थी बने. दूसरे वर्ष वहां से बर्लिन विश्वविद्यालय में चले गयें यहीं पर जेनी के साथ इनका प्रेम हो गया. अठारह वर्षीय मध्य वर्ग के युवक ने साहस करके जेनी के पिता को एक पत्र लिखा. पिता की इच्छा न रहने पर भी जेनी ने विवाह के प्रस्ताव का समर्थन किया.

इस प्रेम कथा का एक उल्लेखनीय परिणाम यह हुआ कि कार्ल कवि बन गए. जेनी को लक्ष्य करके वे बहुत सी स्वरचित प्रेम कविताएं उसके पास भेजते रहे. उनकी कुछ कविताएं प्रकाशित भी हुई थीं. इस प्रकार राजनीतिक क्षेत्र में पहचान कायम करने वाले व्यक्ति ने एक भावुक कवि के रूप में सर्वप्रथम अपने को प्रस्तुत किया.

कार्ल मार्क्स का विद्यार्थी जीवन

1841 में कार्ल को विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में उपाधि मिली. बोन में ही उनका सम्पर्क हेगेल के दार्शनिक मतवाद और उसको मानने वाले युवकों की संगति में आए. ये सबके सब बाइबिल के धर्म सिद्धान्तों के समालोचक थे. इसी समय मार्क्स ने धर्म-विरोधी मनोभाव ग्रहण किया. जो आगे चल कर उनके मतवाद का एक अनिवार्य अंग बन गया. यहां इनके साथियो ने एक दैनिक पत्र निकाला जिसमें उग्र विचारों का प्रतिपादन किया जाता था.

मार्क्स नियमित रूप से इस पत्र में लिखने लगे. उनके तीव्र लेखों से पत्र की ख्याति बहुत बढ़ गयी और कुछ ही महीने के बाद वे पत्र के संपादक हो गये अब वे प्रशिया की सरकार तथा बावर जैसे दार्शनिकों के विरूद्ध जो किसी समय उनके मित्रों में से थे, किन्तु जिसे वे अब एक कल्पनाविलासी क्रां​तिकारी बता कर उसकी निन्दा करने लगे थे, रोष पूर्ण लेख लिखने लगे.

एक संपादक के रूप में उनका यह समय अल्पकालीन सिद्ध हुआ, क्योंकि सेंसर द्वारा पत्र का प्रकाशन बन्द कर दिया गया. इसके बाद पेरिस से एक दूसरा पत्र निकालने का विचार किया गया. इसके लिये तैयारियां होने लगी. इसी बीच मार्क्स ने जेनी के साथ विवाह कर लिया. अपने मित्र रूज को जो अखबार निकालन की तैयारी में लगा हुआ था, मार्कस ने लिखा-‘बिना किसी भावुकता के मैं तुमको सूचित करता हूं कि मै प्रेम में पड़ा हुआ हूं. मेरी प्रेमिका को और मुझे वर्षों तक इस प्रणय-सम्बन्ध के लिय संग्राम करना पड़ा है’

इस वजह से पेरिस से पत्र निकालने का विचार पूरा नहीं हो सका. इसलिए मार्कस् ने पेरिस से प्रकाशित होने वाले एक जर्मन उग्र पंथ पत्र में लिखना शुरू किया. इस बार भी उसके लेखों को सरकार सहन नहीं कर सकी और पेरिस के बाहर कर दिया गया. 1845 के जनवरी में वे पेरिस छोड़ कर ब्रुसल्स चले आये.

मार्क्स और ​एनजिल्स की दोस्ती

फ्रान्स छोड़ने के पहले उनके जीवन में एक ऐसी घटना घटी जिसका स्थायी प्रभाव उनके भावी जीवन पर पड़ा. फ्रेडरिक एनजिल्स के साथ उनकी घनिष्ट मैत्री हो गयी. एनजिल्स भी उग्र विचार के एक युवक थे और मार्क्स से दो वर्ष छोटे थे. दोनों के बीच जो दोस्ती का सम्बन्ध स्थापित हुआ वह आजीवन कायम रहा. एनजिल्स मार्क्स के मित्र, शिष्य, सहकर्मी, वेतन भोगी लेखक और सब से बढ़ कर उनके आर्थिक सहायक अन्त तक बने रहे.

1845 के बसन्त में एनजिल्स मार्क्स से ब्रुसल्स में मिले और उसी वर्ष गर्मी में उनको साथ लेकर लन्दन गये. एनजिल्स ने लन्दन मे मार्क्स को जर्मन श्रमजीवी शिक्षण संघ नामक संस्था से परिचित कराया जिसकी स्थापना कुछ ही समय पहले हुई थी. मार्क्स लन्दन से लौट कर जब ब्रुसल्स आये उन्होंने उसी प्रकार की एक संस्था जर्मन श्रमजीवी संघ नाम से स्थापित की.

इस संस्था का उद्देश्य था साम्यवाद के सिद्धान्तों का अध्ययन एवं प्रचार करना. फिर मार्क्स ने विभिन्न देशों के साम्यवादियों को एकत्र करने के लिये एक कम्युनिस्ट पत्रकार कमेटी कायम की. इसी प्रकार का एक कर्मकेन्द्र स्थापित करने के लिये एनजिल्स पेरिस भेजे गये. 1847 लन्दन में एक सम्मेलन हुआ जिसमें लन्दन पेरिस और ब्रुसल्स के साम्यवादी प्रतिनिधि शामिल हुए.

इसके परिणामस्वरूप एक अन्तर्राष्ट्रीय कम्युनिस्ट विचारधारा का संगठन बनाया गया जिसकी ओर से मार्क्स और एनजिल्स ने प्रसिद्ध कम्यूनिस्ट घोषणापत्र कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो प्रकाशित किया. कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो का प्रथम अध्याय इस रूप में आरम्भ होता है :

‘अब तक जितने समाज हुए हैं उन सब का इतिहास विभिन्न वर्गों के बीच संग्राम का इतिहास है.’’

मार्क्स का दर्शन और सिद्धान्त

मार्कस् का दर्शन इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या है. समाज विभिन्न वर्गो के बनने में जो मूल कारण काम करता है वह है आर्थिक कारण. पैसा कमाने की प्रणालियो मे जो आवश्यक परिवर्तन होते रहते है उन्हीं का सामाजिक परिणाम हमें समाज के अन्दर वर्ग संघर्ष के रूप में देखने को मिलता है. अमीर वर्ग को इस दर्शन में श्रम का खरीदार माना गया और उन्हें बुर्जुआ कहा गया.

अपना श्रम बेचने वाले ने एक सर्वहारा वर्ग का निर्माण कर दिया, जिसके पास अपने को बेचने के सिवा और कुछ नही होता. धनिक वर्ग की आर्थिक शक्ति ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है त्यों-त्यों उसकी संख्या कम होती जाती है और वह अधिकाधिक रूप में श्रमजीवयों का दमन करने लगता है. इस दमन के फलस्वरूप सर्वहारा दल का सामाजिक जीवन संघर्षबद्ध और अनुशासित होता है, आखिर में वह धनतांत्रिक राज्य के सामाजिक संगठन को चूर्ण-विचूणे करके एक नये राज्य का निर्माण करता है जो उत्पादन की नयी शक्तियों के प्रयोजनों की पूर्ति कर सके.

तत्कालिक सुधार के रूप में कम्युनिस्ट मैनिफैस्टो में निम्नलिखित मांगे की गई थी-

  • भूसंपत्ति पर राज्य का अधिकार, उसमें लगान से शासन व्यय चलाना जाये.
  • विदेशियों और विद्रोहियों की संपत्ति की जब्ती.
  • साख और परिवहन का केन्द्रीकरण.
  • स्टेट बैंक की स्थापना जिसका रूपये के लेन-देन पर एकाधिकार हो.
  • कल कारखानों पर राज्य स्वामित्व और कृषि भूमि का पुनः वितरण.
  • सबके लिए श्रम करना अनिवार्य.
  • खेती के लिए मजदूर सेना की भर्ती.
  • कृषि और उद्योग से संलग्न श्रमजीवियों का एकीकरण.
  • बच्चों के लिए सार्वजनिक शिक्षा
  • कारखानों में बच्चों की श्रमजीवी के रूप में भर्ती करने पर निषेध.

इसके आखिर में कहा गया है:
सर्वहारा को अपनी जंजीरो के सिवा और कुछ नहीं खोना है. लाभ में उन्हें सारी दुनिया प्राप्त होगी. सब देशों के श्रमजीवी एक हो जायं.’

कार्ल मार्क्स का संघर्षपूर्ण काल

मार्क्स के विचारों से दुनिया प्रभावित होने लगी और 1848 तक यूरोप के कई देशों में क्रांति की आहट सुनाई देने लगी. इसी बीच बेलजियम की सरकार ने मार्क्स को देश छोड़ देने के लिये कह दिया. वहां से मार्क्स पेरिस आए. 1849 के जुलाई महीने में फ्रांसीसी सरकार ने मार्क्स को परेशान करना शुरू किया. उन्होंने लंदन जाना पंसद किया. इसके बाद उनका जीवन लंदन में ही व्यतीत हुआ.

इस समय उनकी गरीबी अपने चरम पर पहुंच गई थी. दरिद्रता के विरूद्ध उन्हें भीषण संग्राम करना पड़ा. उनके पास में पैसे नहीं थे और न आय का कोई साधन था. वह जिस मकान में रहते थे उसका भाड़ा नहीं चुका सके और मकान मालिक ने मकान से निकाल दिया. फिर वह कहीं और दो कमरे लेकर रहने लगे. दरिद्रता के कारण स्वास्थ्य खराब हो गया. दो बच्चे छोटी उम्र में ही चल बसे.

इतनी गरीबी में भी मार्क्स अपने ग्रन्थ ‘कैपिटल’ के प्रकाशन के लिये जरूरी पैसा जुटाने में लगे रहे. इस आर्थिक संकट काल में मार्क्स अपने मित्र एनजिल्स की उदारता की बदौलत ही​ जिंदा रह पाये थे. एनजिल्स बराबर मार्क्स को रूपये भेजते रहे. उन्हे यहां तक छूट दे रखी थी कि वे खर्च करके उनके नाम से बिल भेज दे. एनजिल्स ने केवल धन से ही नहीं बल्कि अखबारों के लिए लेख लिखने तथा उनके जर्मन लेखों का अंग्रेजी में अनुवाद करने में भी उन्हें सहायता पहुंचाई.

कार्ल मार्क्स का लेखन और किताबें

1851 से 1860 ई० तक वे ‘न्यूयार्क ट्रिबिउनल’ के नियमित लेखक रहे. उन्हें प्रत्येक लेख के लिये दस शिलिंग मिला करता था. इससे घर का भाड़ा, अखबार और डाक का खर्च किसी प्रकार चल जाता था. इस समय राजनीति विषय पर उनके कितने ही निबन्ध प्रकाशित हुए. 1857 में उनके विख्यात ग्रन्थ कैपिटल का प्रथम भाग प्रकाशित हुआ.

द्वितीय एवं तृतीय भाग उनकी मृत्यु के बाद उनके साथी एनजिल्स ने 1885 और 1894 में संपादित करके प्रकाशित किये. कैपिटल में मार्कस् ने अतिरिक्त मूल्य के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया. इसका अर्थ यह था कि एक श्रमजीवी को भरण-पोषण के लिये जितने समय तक काम करना आवयश्यक है और जितने समय तक वह काम करता है, दोनों में जो अन्तर समय का है उस समय का अतिरिक्त मूल्य है. जैसे किसी आदमी को प्रतिदिन पांच शिलिंग मजूदरी मिलती है और पांच शिलिंग का काम वह चार घण्टे में कर सकता है, किन्तु वह आठ घण्टे तक काम करता है.

यह जो अतिरिक्त चार घन्टे वह काम करता है और उत्पादन करता है उसके इस श्रम का जो मूल्य है वही अतिरिक्त मूल्य है. श्रमजीवी को अपने उत्पादन पर अधिकार नहीं होता, किन्तु सम्पूर्ण श्रमजीवी वर्ग को अपने सहयोग मूलक उत्पादन पर सामाजिक अधिकार होता है. सर्वहारा को पूंजीवाद के सामाजिक ढांचे को चूर्ण-विचूर्ण कर देने की आवश्यकता महसूस करनी होगी, इसके बाद ही सर्वहारा का अधिनायक तन्त्र कायम होगा, किन्तु यहं संक्रान्ति काल के लिए ही होगा, क्योंकि लोकतांत्रिक दुनिया में शोषक वर्ग के लिए कोई आर्थिक आधार नहीं रह जाता, वर्ग संघर्ष और वर्गभेद मिटने लग जाते है और उसका आरम्भ सर्वहारा वर्ग के अधिनायक तन्त्र से होता है.

आगे चल कर यह सरकार भी इस अर्थ में सरकार नहीं रह जाती कि वह मनुष्यों पर शासन करे. उसका काम शासन करना कम और नियन्त्रण करना अधिक होता है. इस प्रकार की दुनिया में पुराने अर्थ में राज्य अपनी सेनाओं और कारीगरों के साथ-‘क्षीण होने’ लग जाते हैं. यही मार्क्सवाद है और यही उसका मतवाद है जिसकी प्रतिष्ठा उसकी रचनाओं पर की गई है. इसी मतवाद से प्रेरित होकर लेनिन तथा उसके अन्य सहकर्मियों ने रूस मे क्रांति की और उसे सफल बनाया.

उनके जीवन का सबसे बढ़कर मूल्यवान समय 1837 से 1847 और 1857 से 1871 ई० तक रहा. इस अवधि में ही उन्होंने अपने मूल्यवान ग्रन्थों की रचना तथा अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न किये. उनकी रचनाओं में मुख्य हैं— कम्युनिस्ट मैनिफस्टो, कैपिटल तथा पेरिस कम्यून.’ इनमें सर्वाधिक प्रसार ‘कैपिटल’ ग्रन्थ का हुआ.

कार्ल मार्क्स की मृत्यु

जिस समय मार्क्स ‘कैपिटल’ के दूसरे भाग की रचना को लेकर व्यस्त थे उनकी आर्थिक दशा कुछ अच्छी हो चली थी. लंदन शहर के ऊपरी भाग में अब वह आराम रहने लग गये थे. 1869 मे ऐजिल्स ने अपने कारोबार से मार्क्स को वार्षिक 350 पौंड देने लगे. इसी समय परिवार के उत्तराधिकार से मार्क्स को आठ सौ पौंड मिले. किन्तु कठिन परिश्रम करते-करते उनका स्वास्थ्य खराब हो चुका था.

1851 में उनकी जीवन संगिनी ने कैन्सर की वजह से अपने प्राण त्याग दिये. मार्क्स उस समय फेफड़े के रोग से ग्रस्त थे. इसके बाद वे थोडे़ ही दिन जीवित रह सके. 14 मार्च 1853 को लन्दन में उनकी मृत्यु हुई. उनकी समाधि पर एनजिल्स कहा था-‘मार्क्स का नाम और उनकी कृत्तियां शताब्दियों तक अमर रहेंगी.

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