अमृता शेरगिल की जीवनी Amrita Biography in hindi

अमृता शेरगिल की जीवनी Amrita Biography in hindi

अमृता शेरगिल आधुनिक भारत की प्रख्यात चित्रकारों में से एक हैं. उनका जीवन ढेरों रंगों से सराबोर रहा. उन्होंने अपने अल्प जीवन में ढेरों ऐसी कृतियां बनाई जो आधुनिक चित्रशैली में नायाब कलाकारी का उदाहरण मानी जाती है. उन्होंने अपने चित्रों के माध्यम से गुढ़ भावों की अभिव्यंजना की. उनकी ​शैली में रंगों को लेकर नये प्रयोगों ने चित्रकारी के नये आयाम को जन्म दिया.

अमृता शेरगिल ने अल्पकाल में ही आधुनिक कलाकारों में अपना विशेष स्थान बना लिया था. अमृता शेरगिल ने कला जगत में अपना स्थान तब बनाया जब पूरी दुनिया में ही नारियों को अपनी पहचान बनाने के लिये बहुत संघर्ष करना पड़ता था. उनकी सफलता को नारी सशक्तीकरण के उदाहरण के तौर पर भी रूपायित किया गया.

नाम अमृता शेरगिल
जन्म30 जनवरी, 1913
बुडापेस्ट (हंगरी)
कार्यक्षेत्र चित्रकार
प्रमुख कृतियांप्रोफेशनल माॅडेल, नवयुवतियां, कहानी-वक्ता, ‘नारी
मृत्यु 5 दिसम्बर, 1941 लाहौर

अमृता शेरगिल का प्रारंभिक जीवन

अमृता शेरगिल का जन्म 30 जनवरी, सन् 1913 को बुडापेस्ट में हुआ. उनके पिता पंजाब के रहने वाले, किन्तु माता हंगेरियन थीं. बाल्यावस्था से ही चित्रकला की और उनकी विशेष रूचि थी. जब वे पांच वर्ष की हुई तो अपने बाग के पेड़-पौधों के चित्र कागज पर बनाया करतीं और उनमें रंग भरा करती थीं.

पहले तो किसी का भी ध्यान उनकी चित्रकारी पर नहीं गया, किन्तु धीरे-धीरे उनकी मां अपनी पुत्री की चित्रकारी से प्रभावित हुई और भारत आने पर उन्होंने अमृत के लिए एक अंग्रेज चित्रकार नियुक्त कर दिया.

तीन वर्ष तक उस अंग्रेज-शिक्षक के मार्गदर्शन में वे चित्रकला का अध्ययन करती रहीं और अपनी विलक्षण प्रतिभा, सच्ची लगन, कठोर परिश्रम और दृढ़ इच्छाशक्ति से बहुत कम आयु में ही कुशल चित्रकार बन गई.

अमृत की योग्यता और बुद्धिमत्ता पर वह अंग्रेज-चित्रकार भी दंग रह गया और उसने शेरगिल दम्पति को बाहर विदेशों में अपनी पुत्री को चित्रकारी की उच्च-कोटि की शिक्षा दिलाने की सहमति दी. सन 1924 में शेरगिल-परिवार इटली चला गया.

अमृता शेरगिल के चित्रकारी करिअर का आरंभ

इटली पहुंचने के बाद अमृता ने वहां के आर्ट-स्कूल में दाखिला ले लिया. किन्तु उन्हें संतुष्टि नहीं हुई. भारत लौटने पर उन्होंने घर पर अभ्यास करना शुरू किया और सामने किसी को बैठाकर अथवा तैल-रंगों में चित्र छापने लगीं.

15 वर्ष की अवस्था में ही वे इतनी सुन्दर चित्रकारी करने लगीं कि जो कोई भी उनके बनाए चित्रों को देखता सहसा विश्वास न करता. अंत में अपने माता-पिता के साथ वे पेरिस गई.

पीरे वेना का मार्गदर्शन

पेरिस पहुंचने के बाद वे विश्व ​प्रसिद्ध कलाकार पीरे वेना की शिष्या हो गई. पांच वर्ष तक निरंतर पेरिस में रहकर उन्होंने चित्रकला का ज्ञान प्राप्त किया और धीरे-धीरे पाश्चात्य पद्धति पर तैलरंगों में, बड़े-बड़े कैनवासों, पर चित्र बनाने की अभ्यस्त हो गई.

उनके चित्र विशिष्ट कला-प्रदर्शनियों द्वारा प्रदर्शित किए जाने लगे और छापे गए. तत्पष्चात् वे ‘ग्रेंड संलों’ सदस्या बना ली गई, जो कि एक भारतीय युवती के लिए बहुत ही सम्मान और गौरव का पद था.

अमृता शेरगिल की चित्रकारी शैली

भारत आने पर अमृता ने भारतीय चित्रकला का गहरा अध्ययन किया और उसकी विशेषताओं और बारीकियों को समझा. एक और पेरिस का विलासमय वातावरण, दूसरी और भारत की दयनीय दशा. एक और वैभव की चमक-दमक, दूसरी और मूक वेदना का करूण चीत्कार.

अमृत दुविधा में पड़ गई, किसे छोड़े किसे अपनायें. अन्त में उन्होंने अनुभव किया कि वे एक ऐसी स्थिति में पहुंच गई हैं कि जहां वे स्वतंत्र हैं, उन्हें कोई बन्धन नहीं, वे अपनी इच्छानुसर अपनी कला का मुख मोड़ सकती हैं.

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरण में भारतीय-चित्रकला पर इण्डो-ग्रीक और बौद्ध-कला का विशेष प्रभाव था. धीरे-धीरे गुप्तकालीन कला पर भी लोगों का ध्यान आकृष्ट हुआ और भारतीय कलाकारों ने गुप्तकालीन चित्रकला की सूक्ष्मांकन-प्रणाली को अपनाया. ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना के पश्चात् तो रही-सही भारतीय कला भी नष्ट हो गई.

किन्तु अकस्मात् बंगाल में कला की पुनर्जागृति हुई और श्री अवनीन्द्रनाथ टैगोर, नंदलाल बोस, वेंकटप्पा और जैमिनी राय जैसे कलाविदों का उद्भव हुआ. उनकी चित्रकला में बाहरी चमक-दमक और आकर्षक रंगों का तो बहुलता से प्रयोग किया गया, किन्तु मौलिक कला-तत्त्वों का इनमें अभाव था.

अमृत शेरगिल की कला ने इस क्षेत्र में एक नवीन प्रति​क्रिया की और आधुनिक भारतीय कला का विकसित और संवर्द्धित करने के लिए एक नया कदम उठाया.

उन्होंने अन्य कलाकारों की भांति अजंता और राजपूत कला का अंधानुकरण न करके अपनी कला में पाश्चात्य और पूर्वीय कला के आवश्यक तत्त्वों को लेकर उनका सफल समन्वय किया.

उनकी प्रारंभिक भारतीय पद्धति की चित्रकृतियों में तो राजपूत कला का कुछ प्रभाव झलकता है, किन्तु बाद में तो उन्होंने कला-क्षेत्र में आश्चर्यजनक प्रगति की और दो सर्वथा स्वतन्त्र एवं कई देशों के प्रमुख कला-तत्वों को लेकर एक मौलिक रूप दिया तथा एक नवीन शैली का आरंभ किया.

अमृता शेरगिल की प्रमुख पेंटिंग्स

अमृत शेरगिल ने चित्रों में पहाड़ी दृश्यों का बहुत सुन्दर चित्रण किया है. साधारण जीवन-दशा, आशा-निराशा, सुख-दुःख के आकूल-विह्नल भावों को उन्होंने अपने आकर्षक रंगों और रेखाओं द्वारा अत्यन्त खूबी से व्यक्त किया है.

‘नवयुवतियां’, ‘कहानी-वक्ता’, ‘नारी’ आदि चित्रों में भारतीय और पश्चिम संस्कृति के सफल समन्वय की अद्वितीय झांकी मिलती है. उनकी कला में ऐसी निर्भीकता, शक्ति और यथार्थता थी कि वे अपनी तूलिका के सूक्ष्म रेखांकनों एवं पूर्च और पश्चिम के मिश्रित अलौकिक कला-समन्वय से दर्शकों को मुग्ध कर लेती थी.

‘तीन बहिनें’, ‘पनिहारिन’, ‘वधू-श्रंगार’ आदि उनके चित्रों में जीवन का सौन्दर्य दिखाई देता है. उनका ‘प्रोफेशनल माॅडेल’ एक बेहतरीन चित्र है, जिसमें मार्मिक भावों की सुन्दर अभिव्यंजना हुई है. अमृत शेरगिल की कला पर गोगिन और अजंता चित्रकला का विशेष प्रभाव है.

अमृता शेरगिल का पारिवारिक जीवन

अमृता एक बेहतरीन कलाकार के साथ एक आदर्श पत्नी भी थीं. सन् 1932 में उनका विवाह विक्टर एगन से समपन्न हुआ. उनका दाम्पत्य जीवन बहुत ही सुख और आनन्द से भरा हुआ था. वे अत्यंत स्नेहषील, मिलनसार और मधुर स्वभाव वाली थीं. जो कोई भी उनसे एक बार मिल लेता था, वह उनसे बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकता था.

अमृता शेरगिल का निधन

5 दिसम्बर, 1941 में लाहौर में अमृता शेरगिल का देहान्त हुआ. अपनी 29 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने इतनी ख्याति प्राप्त कर ली थी कि वे विश्वविख्यात कलाकार मानी जाने लगी.

यदि वे कुछ वर्ष और जीवित रहतीं तो कला-क्षेत्र में असाधारण क्रांति मचा देतीं और भारतीय कलाकारों के लिए नई कला-साधना का मार्ग प्रशस्त कर जातीं. किन्तु अपनी कला का पूर्ण सुगन्ध बिखरते हुये वे असमय ही आंखों से ओझल हो गई.

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