अकबर की जीवनी Akbar Biography in Hindi

अकबर की जीवनी Akbar Biography in Hindi

अकबर भारत का मुगल सम्राट था, जो अपने पिता हुमायूं की मृत्यु के पश्चात् गद्दी पर बैठा. उसने लगभग 50 वर्ष तक राज्य किया. अकबर की बहुमुखी प्रतिभा, नेतृत्व कौशल, नीति कौशल, सैन्य संचालन और सभी धर्मों को सम्मान देने की नीति के कारण कुछ इतिहासकारों ने उसे अकबर महान या अकबर द ग्रेट भी कहा है.

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अकबर की संक्षिप्त जीवनी Short Biography of Akbar The Great

अकबर का पूरा नाम जलालुदीन मुहम्मद अकबर था. अपनी अलौकिक प्रतिभा, अदम्य साहस, अथक परिश्रम, धार्मिक सहिष्णुता, साहित्य एवं कलाप्रियता तथा राजनीति-पटुता के कारण अकबर संसार के महान् सम्राटों में गिना जाता है. समकालीन इतिहासकार एवं विदेशी यात्रियो ने उसकी मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है.
अकबर 5 फीट 7 इंच लम्बा था. उन्नत ललाट, बड़ी-बड़ी आंखों, गेहुंआ रंग, गम्भीर आवाज, हंसमुख चेहरे, नम्र और शिष्ट स्वभाव वाला अकबर हर तरह से महान ही था. जिस स्तर का व्यक्ति हो उससे उसी स्तर का वार्तालाप करने की उसमें क्षमता थी. अपनी कुशाग्र बुद्धि से वह बड़ी से बड़ी समस्याओं को तुरन्त सुलझा लेता था.
हिन्दू मित्रों से प्रभावित होने के कारण उसने गौ मांस, लहसुन, प्याज आदि का परित्याग कर दिया था. मांसाहार में उसकी पहले ही रुचि नहीं थी. जीवन के अन्तिम समय मे उसने पूरी तरह से इसका बहिष्कार कर दिया.
अकबर अपनी विलक्षण स्मरणशक्ति की सहायता से गहन विषयों का ज्ञान भी सहज ही प्राप्त कर लेता था. वह कला एवं कलाकारों का सम्मान करना भली भांति जानता था. अपने सम्बन्धियों के प्रति तथा कुटुम्बियों के प्रति वह सदैव दया तथा करुणा का बर्ताव करता था. सलीम की धृष्टता को क्षमा करना इसका ज्वलन्त उदाहरण है.
अकबर की साहित्य, कला, गान विद्या एवं चित्रकला में अभिरूचि उसकी महानता के उदाहरण हैं. उसका हृदय प्रेम का अनन्त स्त्रोत था. वह बिना किसी वर्ण या धर्म के भेद-भाव के सबके साथ सम्मान रूप से न्याय करना चाहता था. हिन्दू-मुस्लिम सदभाव तथा प्रजा को एकता के सूत्र में बांधने की गहरी इच्छा थी. इसके लिये उसने आजीवन प्रयत्न भी किया.
अकबर विलास-प्रिय और कामी स्वभाव का भी था. जहां समस्त भारत विजयी महान सम्राट अपनी महत्ता एवं गौरव को ताक में रखकर साधारण मानव जनों से रंगरेलियां करता तथा आंख-मिचौंनी खेलता था, वह फतेहपुर सीकरी इन सबका ज्वलंत उदाहरण है. उसके समय लगने वाला मीना बाजार इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य कितना ही महान और बड़ा क्यों न हो उसके हृदय में भी वासनाओं तथा आकांक्षाओं का ज्वार उठता रहता है. कुछ इतिहासकार अकबर की वासना और अनियंत्रित कामेच्छा के कारण उसे हजारों महिलाओं के साथ बदसलूकी का जिम्मेदार मानते हैं और उसकी महानता के दावे को सिरे से खारिज करते हैं.

नामजलालुद्दीन मोहम्मद अकबर
जन्म एवं जन्म स्थान15 अक्टूबर 1542, अविभाजित भारत के अमरकोट में
मुत्यु एवं मृत्यु स्थान27 अक्टूबर 1605, फतेहपुर सीकरी में
शिक्षाऔपचारिक शिक्षा नहीं ली
कार्यमुगल बादशाह

अकबर का आरम्भिक जीवन Early life of Akbar

अकबर का जन्म 15 अक्टूबर 1542 को अविभाजित भारत के अमरकोट में हुआ था. हुमायूं की एक सेविका जौहर ने अकबर की जन्म की तारीख 23 नवम्बर 1542 लिखी है. अकबर का पिता हुमायूं शेरशाह सूरी से परास्त हो चुका था और मुगल सत्ता फिर से स्थापित करने का प्रयत्न कर रहा था. अकबर की माता का नाम हमीदा बानो था. अकबर के जन्म के समय हुमायूं पूरी तरह कंगाल हो चुका था, पुत्र-जन्म की प्रसन्नता में मित्रों को भेंट देने के लिए हुमायूं के पास उस समय एक कस्तूरी के थैले के अतिरिक्त कुछ नहीं था. उसने कस्तूरी उपहार में देकर ईश्वर से प्रार्थना की कि इस मुश्क की खुशबू की भांति अकबर की कीर्ति भी चारों ओर फैले.
अकबर जब केवल एक वर्ष का था, तब हुमायूं ने उसे कंधार में अपने भाई कामरान मिर्जा के संरक्षण में छोड़ दिया. क्योंकि बेघरबार हुमायूं का कोई ठिकाना नहीं था, इधर-उधर भटकते हुए वह अपने पुत्र का पालन पोषण कैसे करता.
कामरान मिर्जा ने अकबर की शिक्षा-दीक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं किया. बल्कि 8 वर्ष के बाद जब हुमायूं ने फारस की सेना सहित कामरान को उसकी धृष्टता तथा विश्वासघात का मजा चखाने के लिए कंधार को घेर लिया तो उसने 8 साल के अकबर को किले की दीवार पर खड़ा कर दिया. ताकि पुत्र मोह के कारण हुमायूं अपने तोपखाने का प्रयोग न कर सके.
हुमायूं ने तोपखाने का प्रयोग किया, परन्तु अकबर के भाग्य से उसका बाल भी बांका न हुआ और हुमायूं कंधार विजय करने में सफल हुआ. अब हुमायूं ने अकबर की सैनिक शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया. हुमायूं दिल्ली के तख्त को पुनः हासिल करने में सफल तो रहा, पर बदकिस्मती से ज्यादा दिन तक उस पर बैठ नहीं पाया. जनवरी 1956 में एक दुर्घटना में हुमायूं की मृत्यु हो गई.

अकबर का शासनकाल (1556-1605)

अकबर का राज्याभिषेक

हुमायूं की मृत्यु के बाद उसके भरोसेमंद और अकबर के संरक्षक बैरम खां ने पंजाब के कलानौर में अकबर का राज्याभिषेक कर दिया. अकबर मात्र 13 साल 4 महीने का था, जब उसे शहंशाह घोषित किया गया. पर वह हाथी, ऊंट, घोड़े की सवारी तथा युद्ध-कला में कुशल हो चुका था. इसके बाद अकबर अपने अदम्य साहस और धैर्य से परिस्थिति पर विजय प्राप्त कर जीर्ण-क्षीर्ण अव्यवस्थित मुगल-साम्राज्य को विशाल तथा सुदृढ़ साम्राज्य का रूप देने में सफल हुआ.

पानीपत का दूसरा युद्ध

दिल्ली के तख्त पर विराजमान सुल्तान आदिल शाह सूरी को जब अकबर के राज्याभिषेक के बारे में पता चला तो उसने अपने सहयोगी पराक्रमी हिंदू सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य (हेमू) को अकबर और बैरम खां का मुकाबला करने के लिए दिल्ली से भेजा. इस देखकर मुगलों के होश उड़ गए और सबने बैरम खां को यह सलाह दी कि वह काबुल लौट चले परन्तु उसने इसे अस्वीकार कर दिया और युद्ध-स्थल पर प्राणों की बलि देने का व्रत ले लिया.
पानीपत में 5 नवम्बर 1556 को हेमू विक्रमादित्य और अकबर की सेना में सामना हुआ. इस युद्ध को इतिहास में पानीपत की दूसरी लड़ाई कहा जाता है. हेमू युद्ध में बढ़त बनाए हुए था, कि दुर्भाग्य से मुगल सेना का एक तीर हेमू की आंख में जा लगा और वह बेहोश होकर अपने अपने हाथी से नीचे गिर पड़ा.
इस घटना से हेमू की विजय पराजय में बदल गई. उसे बन्दी बना लिया गया और अकबर के सामने लाया गया. बैरम खां ने उसे हेमू का वध कर गाजी पद प्राप्त करने की मन्त्रणा दी. परन्तु अकबर ने पराजित शत्रु के साथ ऐसा घृणित व्यवहार करने से मना कर दिया, जिस पर बैरम खां ने अपनी तलवार से हेमू का वध कर दिया.
पानीपत की इस विजय से 1500 हाथी तथा बहुत बड़ी मात्रा में धन और सोना-चांदी मुगल सेना को हाथ लगा. दिल्ली व आगरा तथा उसके निकटवर्ती प्रदेश पर उनका अधिकार हो गया. पानीपत की दूसरी लड़ाई मुगलों और अफगानों के बीच दिल्ली की सत्ता हासिल करने के लिए हुई संघर्ष में निर्णायक साबित हुई. इसके बाद आने वाले 300 साल तक दिल्ली के शासन की बागडोर मुगलों के पास ही रही.

सिकन्दर शाह सूरी की पराजय

पानीपत के युद्ध के बाद अकबर और बैरम खां ने सिकन्दर सूरी की ओर ध्यान दिया. हेमू संघर्ष से पहले 1555 में हुमायूं ने उसके विरूद्ध एक सेना भेजी थी. परन्तु वह बिना युद्ध किये ही शिवालिक पर्वत की ओर चला गया था और मानकोट के दुर्ग में शरण ले ली थी.
पानीपत में जीत हासिल करने के बाद अकबर और बैरम खां ने मानकोट के किले का घेरा डाल दिया. छह महीने से अधिक समय बीत गया. तंग आकर सिकन्दर सूरी सन्धि करने को तैयार हो गया. उसने 25 जुलाई 1557 को आत्म-समर्पण कर दिया और किले पर मुगल सेना ने अधिकार कर लिया. सिकन्दर शाह सूरी को बिहार में जागीर दे दी गई, लेकिन कुछ ही समय बाद अकबर ने उसे वहां से भगा दिया. सिकन्दर सूरी वहां से बंगाल चला गया, जहां 1559 में उसकी मृत्यु हो गई.
मुहम्मद शाह आदिल तथा दूसरे अफगान प्रतिद्वन्द्वी 1557 में ही बंगाल शासक से युद्ध करते हुए मारे जा चुके थे. इस प्रकार एक ही वर्ष के अल्पकाल में बैरम खां मुगल-साम्राज्य को सुदृढ़ तथा सुरक्षित बनाने में सफल हुआ.
वर्ष 1558 में उसने अजमेर, ग्वालियर और जोधपुर को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया.

बैरम खां की हत्या

बैरम खां जन्म से तुर्कमान तथा धर्म से शिया था. अपनी योग्यता, अनुभव तथा आयु के कारण मुगल वर्ग में उसने विशेष प्रभाव प्राप्त कर लिया था. वह उच्चकोटि का राजनीतिज्ञ तथा कठोर नियन्त्रक था. परन्तु अहंकारी व्यवहार के कारण बैरम खां के अनेक शत्रु हो गये. ये शत्रु अकबर के साथ उसके सम्बन्धों को बिगाड़ने का प्रयास करते रहते थे. इसी बीच, बैरम खां ने क्रोध में आकर अकबर के निर्दोष दरबारी पीर मुहम्मद को प्राणदण्ड दे दिया. शिया होने के कारण मुगल दरबार का सुन्नी वर्ग उसका विरोधी हो गया. इसी बीच, अकबर को सूचना मिली कि बैरम खां कामरान मिर्जा के पुत्र अब्दुल कासिम को गद्दी पर बैठने का षड्यन्त्र रच रहा है. यह जानकर अकबर ने बैरम खां को मक्का भेजने की घोषणा कर दी.
बैरम खां ने मक्का जाने के बजाय अकबर के विरुद्ध षडयंत्र करना शुरू कर दिया. वह राजपूताने के रास्त गुजरात के पाटन पहुंचा. वहां के सूबेदार ने उसकी अच्छी खातिरदारी की. वहां एक अफगान को बैरम खां की मौजूदगी के बारे में पता चला, जिसका पिता मुगलों के साथ युद्ध में मारा जा चुका था. पाटन में 31 जनवरी 1561 को उस अफगान ने बैरम खां की हत्या कर दी.

खान जमां का विद्रोह Revolt by Khan Zaman

पानीपत के द्वितीय युद्ध में पराक्रम दिखाने के कारण अकबर ने अपने एक उजबेक सरदार को खान जमां की उपाधि से विभूषित किया. 1560 में बंगाल के अफगान सरदारों ने मुहम्मद शाह आदिल के पुत्र शेरशाह द्वितीय के नेतृत्व में दिल्ली पर अधिकार करने की चेष्टा की. खान जमां को इस अफगान विद्रोह को कुचलने के लिए बंगाल भेजा गया. इस कार्य में वह सफल हुआ. परन्तु उसने विजय में मिले हाथी और लूट का माल अकबर की सेवा में भेजने से इंकार कर दिया और जौनपुर में एक स्वतंत्र शासक की भांति राज्य करने लगा. अकबर स्वयं उसके विरुद्ध सेना लेकर जौनपुर गया. जब खान को यह पता चला तो उसने मय माल असबाब आत्म-समर्पण कर दिया. अपनी स्वाभाविक उदारता के कारण अकबर ने उसे क्षमा दान देकर जौनपुर का शासक बना दिया.

आधम खान का विद्रोह Revolt by Adham Khan

अकबर ने 1561 में मालवा के शासक बाजबहादुर पर विजय प्राप्त करने के लिए माहम अनगा के पुत्र और अपने सौतेले भाई आधम खान को भेजा. वह शीघ्र ही विजय प्राप्त करने में सफल हुआ. परन्तु खान जमां की भांति उसने भी लूट का माल बादशाह की सेवा में न भेज विद्रोह कर दिया. जनता तथा सैनिकों की सहानुभूति अपनी ओर करने के लिए उसने उन्हें अमूल्य भेंट दी तथा उनमें अथाह धन वितरण किया. अकबर को जब यह सूचना मिली तो वह तुरन्त एक विशाल सेना लेकर मालवा पहुंचा और अकस्मात् आधम खान ने समस्त माल पर अधिकार कर लिया. आधम खान को क्षमा कर दरबार में ही रहने की आज्ञा दे दी गई और पीर मुहम्मद खां को मालवा का गवर्नर बना दिया गया. कुछ ही दिनों पश्चात् 1562 में एक रात को अधमखां ने शमसुद्दीन नामक एक उच्च पदाधिकारी का वध कर दिया, जिसे अकबर मन्त्री बनाना चाहता था. इससे क्रोधित हो अकबर ने आधम खां को किले की दीवार से नीचे दो बार गिरवा कर मरवा डाला. माहम अनगा को जब अपने इकलौते पुत्र की मृत्यु की सूचना मिली तो उसे बहुत दुख हुआ और कुछ ही दिन पश्चात् उसकी भी मृत्यु हो गई.

पीर मुहम्मद की मृत्यु Death of Pir Muhammad Khan

आधम खान के पश्चात् पीर मुहम्मद मालवा का गवर्नर नियुक्त किया गया था. पीर मुहम्मद के दुर्व्यवहार से असंतुष्ट होकर जनता बाजबहादुर के नेतृत्व में विद्रोह करने के लिए संगठित हो गई. बहादुर ने खानदेश के सुल्तान की सहायता से मुगलों को प्रांत छोड़ने को बाध्य कर दिया. पीरमुहम्मद स्वयं जब अपनी पराजित सेना सहित नर्मदा नदी पार कर रहा था तो नदी में डूब कर मर गया.
अब अकबर ने अब्दुल्ला खां उजबेग को एक सेना लेकर मालवा भेजा. उसने बाजबहादुर को पूर्णतया परास्त किया. अब्दुल्ला मालवा का गवर्नर बना दिया गया.
उजबेगों का विद्रोह
आगे चलकर बाजबहादुर भी मुगल सेना में भर्ती हो गया, लेकिन अब्दुल्ला खां उजबेग ने स्वयं विद्रोह कर दिया. अकबर स्वयं उसे दबाने के लिए मालवा पहुंचा तो अब्दुल्ला गुजरात की ओर भाग गया. अकबर ने भी उसका पीछा किया. अब्दुल्ला जौनपुर चला गया, और यहां खानजमां से मिलकर मुगल साम्राज्य को नष्ट कर उजबेग राज्य की स्थापना करने के लिए विद्रोह कर दिया. बाबर के समय के पश्चात् उसके शत्रु उजबेगों का मुगलों के विरूद्ध यह अंतिम विद्रोह था.
जब 1565 ई० में उजबेग मुगल सेना को परास्त करने में सफल हुए तो पूरे देश में विद्रोह की आग भड़क उठी. बंगाल में अफगानों ने विद्रोह कर दिया. उत्तर की ओर अकबर के भाई मिर्जा हकीम ने पंजाब पर आक्रमण कर शान्ति स्थापित की. फिर, वह पूर्व की ओर गया. इलाहाबाद के निकट उसने उजबेगों को परास्त किया. खानजमा मारा गया और उसके साथियों को कठोर दण्ड दिया गया.

1567 के बाद अकबर की स्थिति

बैरम खां के बाद अकबर कुछ दिन दरबारी दल के प्रभाव में रहा, जिसकी नेता उसकी सौतेली मां माहम अनगा थीं. लेकिन, धीरे-धीरे वह उसके प्रभाव से मुक्त होता गया. जब उसने माहम अनगा के पुत्र आधम खान को किले की दीवार से गिरवा कर मरवा डाला, तो यह प्रभाव पूर्णतया समाप्त हो गया. इस प्रकार 1567 तक अकबर की स्थिति सभी प्रकार से मजबूत हो गई.

अकबर की राजपूत नीति Rajput Policy of Akbar in Hindi

उजबेगों तथा मालवा की समस्याओं को हल करने तथा आन्तरिक शान्ति स्थापित करने के बाद साम्राज्यवादी अकबर पूरे भारत विजय की योजना बनाने लगा. परन्तु अकबर ने अब तक समझ लिया था कि बिना बहुसंख्यक हिन्दुओं के सहयोग के भारत में एक छत्र राज्य स्थापित करना बहुत कठिन है.
राजपूतों की सैन्य कुशलता से अकबर पहले ही बहुत अधिक प्रभावित था. अतः हिन्दुओं, विशेषकर राजपूतों के निकट आने के लिए उसने सम्बन्ध स्थापित करने, हिन्दू मान-मर्यादा तथा सभ्यता को उचित स्थान प्रदान करने की सोची.
राजपूतों के साथ अच्छे सम्बन्ध स्थापित करने का यह भी एक विशेष कारण बताया जाता है कि मुगल दरबार में विदेशी गुट प्रभावी और उसे भय था कि यदि इससे अधिक प्रभावशाली देशी गुट नहीं बनाया जायेगा तो तुर्क, अफगान और उजबेग सदैव बादशाह को परेशान करते रहेंगे. मुगल राजधानियां देहली तथा आगरा की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए भी राजपूतों के साध मधुर सम्बन्ध बनाना जरूरी था. उन्हें भरोसे में लिये बिना सुदूर दक्षिण अथवा पूर्व मंा विजय प्राप्त करने के लिए जाना जोखिम भरा था. ऐसे में महत्वाकांक्षी अकबर ने राजपूतों को मित्रता और रिश्तों में बांधने का फैसला लिया.

अकबर के विवाह सम्बन्ध Marriages of Akbar

अकबर ने अपनी उद्देश्य पूर्ति के लिए राजपूताने की प्रमुख रियासतों को संधि-सन्देश भेजे. बहुत सी रियासतों ने इन्हें स्वीकार कर अकबर से सन्धि कर उसके साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये. आमेर के राजा भारमल ने 1562 में अपनी बड़ी पुत्री का विवाह अकबर से कर दिया. इसके फलस्वरूप अकबर को एक प्रभावशाली राजपूत वर्ग का सहयोग प्राप्त हुआ.
अकबर की अनेक बीवियों में एक और बड़ी प्रभावशाली थी, जिसका नाम था सलीमा बेगम. वह अकबर की बुआ की बेटी थी और उसके संरक्षक बैरम खां से ब्याही गई थी. बैरम खां की हत्या हो जाने के बाद अकबर ने सलीमा से विवाह किया. सलीमा का अकबर के शासन में बड़ा दखल था, वह 1621 में मरी.

दिल्ली से आगरा राजधानी लाना Shifting Capital from Delhi to Agra

अक्टूबर 1558 में अकबर दिल्ली से दल-बल सहित यमुना नदी से नाव द्वारा आगरा पहुँचा. वहीं उसने अपनी नई राजधानी बनाकर भारत में अपना विस्तृत साम्राज्य स्थापित किया. इससे पहले, बाबर और शेरशाह सूरी ने भी आगरा को महत्व दिया था, लेकिन आगरा को सही वैभव अकबर की राजधानी बनने के बाद ही मिला.

अकबर के दरबार में हिन्दू

अकबर ने राजपूतों और अन्य हिन्दुओं को अपने दरबार में ऊंचे पद दिए. माल-विभाग में राजा टोडरमल माल मंत्री बनाये गए. राजा भारमल, भगवानदास तथा मानसिंह को पांच हजारी मनसबदार बना कर सेना में सर्वोच्च पद प्रदान किया गया. बीरबल के सर्वप्रिय चुटकले अकबर और बीरबल की मित्रता का परिचायक हैं. इसी प्रकार, अकबर की सेवा में कई हिन्दू पदाधिकारी तथा सैनिक तैनात थे.

अकबर की धार्मिक नीति Religious Policy of Akbar in Hindi

उदारता तथा धार्मिक सहिष्णुता अकबर के विशेष आधार थे. उससे अपनी समस्त जनता को धार्मिक स्वतन्त्रता प्रदान कर अपने मानव प्रेम का परिचय दिया. उसने जजिया तथा अन्य धार्मिक कर हटा लिए, जो हिन्दुओं तथा अन्य धर्म मानने वालों से अपने तीर्थ-स्थान पर जाने के लिए वसूले जाते थे. उसने मुसलमानों की भांति हिन्दू प्रजा से भी अच्छा बर्ताव करना शुरू कर दिया. यही नहीं, हिन्दू जनता को प्रसन्न करने के लिए उसने कभी-कभी उनके रीति-रिवाज तथा त्यौहार भी मनाना आरम्भ कर दिया था. कहा जाता है कि वह कभी-कभी तिलक लगाकर हिन्दू वेश भी धारण करता था.

अकबर के सामाजिक सुधार Social reforms by Akbar

धीरे-धीरे हिन्दू-जनता के सुधार में अकबर की विशेष रुचि हो गई. उसने बाल विवाह निषेध कर दिया और विधवा विवाह को प्रोत्साहन देकर सती प्रथा पर रोक लगाने का प्रयास किया. यही नहीं उसने अन्तर्जातीय विवाह का प्रचार भी किया. उसने प्रयास किया कि हिन्दू और मुसलमान बिना किसी धार्मिक तथा सामाजिक भेद-भाव के एक-दूसरे के साथ मरदसे तथा पाठशाला में शिक्षा प्राप्त करें. हिन्दू मुस्लिम साझा संस्कृति की भावना से उसने दीन-ए-इलाही सम्प्रदाय की स्थापना भी की.

अकबर की उत्तर भारत में विजय

हिन्दुओं की सहानुभूति प्राप्त कर और अजमेर, ग्वालियर. जोधपुर और मालवा को जीत कर अपनी स्थिति मजबूत करने के पश्चात अकबर ने भारत दिग्विजय की सोची. छोटे-छोटे स्वतन्त्र राज्य उसकी आंखों में खटकने लगे और वह उन्हें किसी-भी बहाने जीतकर अपने साम्राज्य मे मिलाने की सोचने लगा.

रानी दुर्गावती और अकबर का युद्ध Gondwana Queen Durgavati

1564 में साम्राज्यवादी अकबर ने एक फौज कड़ा-मानिकपुर के गवर्नर आसफ खां के नेतृत्व में गोंडवाना विजय करने भेजी. यहां का राजा वीरनारायण अभी बालक ही था. अतः उसकी माता दुर्गावती उसकी सरंक्षक बनकर शासन कर रही थीं. वह एक नीति-निपुण राजपूत महारानी थीं. उन्होंने स्वयं सेना का नेतृत्व कर वीरता-पूर्वक मुगलों का सामना किया और उनके दांत खट्टे कर दिए. उनकी वीरता तथा अद्भुत पराक्रम को देखकर मुगल सेना आरश्चर्य चकित हो गई. अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए हजारों स्त्री-पुरुषों और बच्चों ने प्राण दे दिए. दुर्गावती तथा उसका पुत्र वीरनारायण वीरगति को प्राप्त हुए और गोंडवाना पर अकबर का अधिकार हो गया.

अकबर का चित्तौड़ पर आक्रमण

समस्त भारत पर राज्य करने का इच्छुक अकबर अपनी सीमा के निकट चित्तौड़ तथा रणथम्भौर जैसे मजबूत राज्यों के अस्तित्व को किसी प्रकार सहन नहीं कर सकता था. अकबर से विवाह सम्बन्ध तो दूर की बात रही, राणा उसकी अधीनता स्वीकार करने को भी तैयार न थे. यह अकबर को असह्य हो उठा.
राणा सांगा की मृत्यु हो चुकी थी और अब उनके तीसरे पुत्र राणा उदयसिंह मेवाड़ पर राज्य करते थे. वह अपने पिता की भांति वीर योद्धा नहीं थे. अकबर ने इसे स्वर्णिम अवसर समझा.
मेवाड पर आक्रमण करने के लिये अकबर को एक बहाना भी मिल गया. वह यह था कि उदयसिंह ने मालवा के हाकिम बाजबहादुर को शरण दी थी. इन सब कारणों से अकबर एक विशाल सेना लेकर 1567 में चित्तौड़ विजय करने को निकल पड़ा. शिवपुर, कोटा और माण्डलगढ़ के किलों को जीतकर उसने चित्तौड़ पर घेरा डाल दिया. यह देखकर सेनापति जयमल ने राणा उदय सिंह को बाल-बच्चों सहित उदयपुर की पहाड़ियों में भेज दिया. वीर सेनापत्ति जयमल बड़ी वीरता-पूर्वक लड़ते रहे. जब अकबर को घेरा डाले कई माह बीत गये तो उसने किले को सुरंग से उड़ाने की आज्ञा दी. उसके इंजीनियरो ने दो सुरंगें किले तक पहुचांकर तीन बुर्ज बारूद से उड़ा दिये, परन्तु राजपूतों ने उन्हें पुनः बना दिया. जयमल ने सिर्फ आठ हजार के साथ विशाल मुगल सेना से लोहा जमकर लोहा लिया. इसी बीच में एक रात को उसने जयमल को दुर्ग की मरम्मत कराते देखा. अकबर ने तुरन्त उसको गोली का निशाना बनाया. जयमल घायल होकर गिर पड़ा.
जयमल की इस असामयिक दुर्घटना से सेना का साहस टूट गया. उधर दुर्ग में भोजन सामग्री भी कम हो चली थी और मृत्यु सैनिकों की आंखो के सामने नग्न नृत्य कर रही थी. यह देख उन्होंने जौहर करने का दृढ़ संकल्प किया. स्त्रियां और बच्चे दहकते हुए अंगारों पर कूद पड़े. उधर, वीर राजपूत केसरिया बाना पहन कर अंतिम युद्ध में कूद पड़े. अन्त में वह अपने वीर सेनापति सहित वीरगति को प्राप्त हुए और चितौड़ दुर्ग पर मुगलों का अधिकार हो गया.

अकबर का रणथम्भौर पर आक्रमण

चितौड़ विजय के थोड़े ही समय बाद अकबर ने एक सेना रणथम्भौर विजय के लिये भेजी और स्वयं भी फरवरी 1569 में वहां जा पहुंचा. उसने एक निकटवर्ती पहाड़ी से किले के अन्दर गोलाबारी करने की योजना बनाई जो सफल हुई. राजपूत राजा सुर्जनहार इस गोलाबारी से निराश हो गया. उसने अकबर के सामने सन्धि प्रस्ताव रखा और अपने दो पुत्र सम्राट की सेवा में भेजे. अकबर ने उनके साथ बहुत अच्छा बर्ताव किया और उन्हे सम्मानसूचक पोषाक भेंट देकर वापिस अपने पिता के पास भेज दिया. राजा बादशाह की इस उदारता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने अकबर की सेवा की इच्छा प्रकट की. वह पहले गढ़ कटक का किलेदार और फिर बनारस व चुनार का गवर्नर बना दिया गया.
कालिंजर विजय
फरवरी 1569 में जब अकबर स्वयं रणथम्भौर विजय के लिये चला तब उसने एक सेना मजनू खां के नेतृत्व में कालिंजर के प्रसिद्ध किले को जीतने के लिये भी रवाना कर दी. इस सेना ने किले का घेरा डाल दिया. इसी बीच रणथम्भौर का पतन हो गया. मेवाड़ पतन पहले ही हो चुका था. यह सब देख कालिंजर के राजा रामचन्द्र ने संधि करने में ही अपना हित समझा. अतः बिना युद्ध किये ही कालिंजर दुर्ग मुगल-सेना के सुपुर्द कर उसने आत्म समर्पण कर दिया. राजा को इलाहाबाद के निकट जागीर दे दी गई और कालिंजर मजनू खां के सुपुर्द कर दिया गया.

महाराणा प्रताप और अकबर के बीच युद्ध Maharana Pratap and Akbar fight in Hindi

मेवाड़ पतन, रणथम्भौर विजय तथा कालिंजर समर्पण के बाद कई छोटी-छोटी रियासतें मुगल साम्राज्य में विलीन हो गई. मेवाड के राणा उदयसिंह जो चित्तौड़ आक्रमण के समय अरावली की पहाड़ियों की ओर चले गए थे, वे ही स्वतंत्र रह गए थे.
उदयसिंह ने वहां वर्तमान उदयपुर नामक नगर बसाया और एक स्वतन्त्र शासक की भांति राज्य करने लगे. 1572 में उनका देहान्त हो गया और उसकी जगह राणा प्रतापसिंह गद्दी पर बैठे. उन्होंने हिन्दुत्व तथा स्वतन्त्रता की रक्षार्थ अपने जीवन की बलि देने की दृढ़ प्रतिज्ञा की. इसमें सन्देह नही कि मुगल-साम्राज्य के साधनों तथा उसके असंख्य-दल को देखते हुए सफलता की अधिक आशा न थी, परन्तु फिर भी यह महान राणा जीवन पर्यन्त मुगलो से संघर्ष करता रहा. वे मेवाड़ राज्य के अधिकतर भाग पर अधिकार प्राप्त करने मे सफल हुए और उन्हें महाराणा के रूप में जाना गया.

महाराणा प्रताप और मानसिंह की भेंट

इसी बीच 1576 में एक दिन गुजरात से लौटते हुए राजा मानसिंह उदयपुर गये. महाराणा प्रताप ने उनका बहुत आदर सत्कार किया परन्तु भोजन के समय स्वयं उनके साथ भोजन करने न आये वरन् अपने पुत्र अमरसिंह को भेज दिया. न आने का कारण राजा मानसिंह को नीचा समझना था, क्योंकि उनकी बुआ का विवाह विवाह अकबर से हुआ था. मानसिंह यह बात ताड़ गये. वह भोजन छोड़कर उठ खड़े हो गये और तुरन्त उदयपुर से चल दिये.
इसी बीच किसी राजपूत ने व्यंग्य कस दिया, ‘‘कुवंर साहब जब आप मेवाड़ लौटकर आयें तो अपने साथ फूफा अकबर को भी लेते आना.’’ यह बात मानसिंह को बहुत बुरी लगी. उसने सारी घटना अकबर को सुनाई जिसे सुनकर वह क्रोधित हो उठा.

हल्दीघाटी का युद्ध Battle of Haldighati in Hindi

अकबर ने राजा मानसिंह तथा आसफ खां को एक शक्तिशाली सेना लेकर राणा प्रताप से बदला लेने मेवाड़ भेजा. मांडलगढ़ होती हुई मुगल सेना हल्दीघाटी के स्थान पर पहुंची. यहां मुगलों और राजपूतों में घोर युद्ध हुआ. भीषण युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप परास्त हुए और कुछ साथियों का लेकर पहाड़ियों की ओर चल गये. एक-एक करके मुसलमानो ने उनके सभी किलों पर अधिकार कर लिया, परन्तु उदयपुर राणा के अधिकार में ही रहा. महीनों तक गोगून्दा नामक गांव में पड़े रहने के बाद मानसिंह और आसफ खां अजमेर लौट गये.
जैसे ही वे लौटे, प्रताप पर्वतों से आए और अजमेर, चित्तौड़ तथा मांडलगढ़ के अतिरिक्त समस्त मेवाड़ पर पुनः अधिकार कर लिया. इस प्रकार हल्दीघाटी की लड़ाई से मुगलों को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ.
इस युद्ध के बाद अकबर ने महाराणा प्रताप को बन्दी बनाने के लिये कई बार सेना भेजी परन्तु वह स्वतन्त्र ही रहे. इस विपरीत काल में उनका हृदय तनिक भी विचलित न हुआ. अकबर केवल नाममात्र की अधीनता स्वकार करने पर ही संतुष्ट हो जाता, परन्तु राणा ने अपने महान् आदर्श और आन-बान-शान की रक्षा के लिए जीवन-पर्यन्त युद्ध करना ही श्रेयस्कर समझा.

अकबर की गुजरात विजय

कुछ समय के लिए हुमायूं ने गुजरात पर अपना आधिपत्य कर लिया था. परन्तु शेरशाह सूरी के संघर्ष के समय यह पुनः स्वतन्त्र हो गया था. अतः अकबर गुजरात को मुगल साम्राज्य का भाग समझता था. इसके अतिरिक्त उसके राज्यकाल में भी असन्तुष्ट मिर्जा, उजबेग अथवा अन्य वहां जाकर शरण लेते थे और साम्राज्य विरोधी योजनाएं बनाते थे. दूसरे, गुजरात समुद्री व्यापार का केन्द्र था, वहां का व्यापार राजकीय आय का बहुत बड़ा साधन हो सकता था.
इसलिए अकबर ने गुजरात पर आक्रमण कर दिया, जब वहां के राजा मुफ्फरशाह को यह सूचना मिली तो वह भाग खड़ा हुआ. इस प्रकार बिना युद्ध किये ही अकबर ने गुजरात मिर्जा अजीज कोका को सुपुर्द कर दिया और सूरत को घेर डाला. शीघ्र ही इसका पतन हो गया. इस प्रकार सम्राट पुर्तगालियों के सम्पर्क मे आया.
अकबर के फतेहपुर सीकरी लौटते ही मिर्जाओं ने विद्रोह कर दिया. इस पर 6 दिन में 600 मील की यात्रा कर वह शीघ्र अहमदाबाद पहुंचा और विद्रोहियों को पूर्णतया परास्त किया. गुजरात प्रान्त देहली साम्राज्य मे सम्मिलित कर लिया गया.
राजा टोडरमल को वहां की आर्थिक व्यवस्था ठीक करने के लिए नियुक्त किया गया. गुजरात-विजय से राजकोष मे 50 लाख रूपये वार्षिक की वृद्धि हुई जिससे आर्थिक दशा सुदृढ़ हुई. इस विजय से अकबर पुर्तगालियो के सम्पर्क मे लाया. यह सम्पर्क आगे चलकर बड़ा महत्पूर्ण सिद्ध हुआ.

अकबर की बंगाल और बिहार विजय

वर्ष 1564 में सुलेमान कर्रानी नामक सरदार बंगाल में एक स्वतन्त्र शासक की भांति राज्य करता था. समय की गति को पहचान उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली. उसकी मृत्यु के पश्चात् 1572 में उसका पुत्र दाऊद खां गद्दी पर बैठा. उसने अपने नाम का खुतवा पढ़वाना तथा अपना सिक्का चलाना प्रारम्भ कर दिया. यह देखकर अकबर स्वयं एक विशाल सेना लेकर बंगाल की ओर अग्रसर हुआ और दाऊद को पटना व हाजीपुर से निकाल बाहर किया. उड़ीसा में दाऊद खां पूरी तरह परास्त हुआ और उसने आत्म समर्पण कर दिया. इस तरह अकबर ने बंगाल तथा बिहार को मुगल साम्राज्य में मिलाया.
अकबर ने मुनइम खां को बंगाल का गवर्नर नियुक्त किया. 1575 में मुनइम का देहान्त हो गया, इससे लाभ उठा कर दाऊखां ने फिर बंगाल पर अधिकार कर लिया. जिसकी सूचना पाकर अकबर आग बबूला हो उठा. उसने तुरन्त एक सेना उसके विरूद्ध भेजी. वह परास्त हुआ और 1576 में राजमहल नामक स्थान पर बन्दी बना लिया गया. बंगाल पुनः मुगल-साम्राज्य में सम्मिलित हो गया और खान जहां वहां का गवर्नर नियुक्त हुआ. 1580 में खान जहां की मृत्यु हो गई. उसके पश्चात् विद्रोह के कारण बहुत दिन तक बंगाल में अशांति तथा अराजकता का साम्राज्य रहा. इस विद्रोह के कई कारण थे, जैसे खान जहां की मृत्यु के बाद नियुक्त हुआ नया गवर्नर मुजफ्फरखां तुर्वती कुछ कठोर प्रकृति का मनुष्य था. इसके अतिरिक्त उसने भूमि कर सम्बन्धी कुछ ऐसी विज्ञप्तियां निकाली थीं जिससे कृषक-वर्ग को अधिक कर देना पड़े. इससे बहुत असन्तोष फैला. उसने काजी, उलेमा और जागीरदारों के अधिकारों और पदों की जांच कराई जिससे वह बहुत भयभीत हुए.
इसी समय, सेना में भी एक कारण से असन्तोष फैल गया. बंगाल के अस्वस्थ जलवायु के कारण अकबर ने इस प्रान्त के सैनिको का भत्ता बढ़ा दिया था. परन्तु जब मनसूर अर्थ मन्त्री हुआ तो उसने यह भता आधा कर दिया. इससे सैनिक वर्ग भी क्षुब्ध हो उठा.
उधर, इसी समय अकबर ने अपने नये धर्म दीन-ए-इलाही की घोषणा की, जिसे सुनकर मौलवियों तथा मुल्लाओं ने उसे धर्म से विमुख कह फतवा दे दिया कि सम्राट मुसलमान नही है. अतः उसके विरूद्ध विद्रोह करना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है. इसी प्रकार विद्रोह की पूर्ण सामग्री एकत्रित हो गई.
सर्वप्रथम चगताई ककशाल ने ‘दाग कर’ देने से मना कर दिया और बाबा खां के नेतृत्व में राजधानी पर चढ़ आये. दूसरे लोगों ने उसका साथ दिया.
राजा टोडरमल का विद्रोह शान्त करने के लिए भेजा गया, परन्तु विद्रोही शक्तिशाली हो गये थे और स्थिति अत्यन्त शोचनीय थी. प्रान्तीय गवर्नर मुजफ्फर खां का वध कर उन्होंने समस्त बंगाल और बिहार पर अधिकार कर लिया था. यह सुन सम्राट ने अजीज कोका को टोडरमल की सहायता के लिए भेजा. दोनों सेनापतियों ने मिलकर ककशाल वर्ग को परास्त कर दिया.
इसी बीच जौनपुर में विद्रोह की आग भड़क उठी. वहां के जागीरदार मासूम फरखदी ने अपने आपको स्वतन्त्र घोषित कर दिया. शाहबाज खां ने उसे परास्त कर हिमालय की पहाड़ियों की ओर भगा दिया. परन्तु अजीज कोका की सिफारिश से उसे क्षमा कर दिया गया;. जिसके थोडे समय पश्चात उसके निजी सेवक ने उसका वध कर डाला.

अकबर की काबुल विजय

कट्टर मुसलमानों ने विषेषतया पूर्वी प्रान्त के निवासियों ने बादशाह के विरूद्ध फतवा सुनकर विद्रोह कर दिया और उसे गद्दी से उतार कर उसके सौतेले भाई मिर्जा हकीम को गददी पर बैठाने की सोची. मिर्जा हकीम ने स्वयं एक सेना पंजाब पर आक्रमण करने के लिये भेजी. परन्तु जब यह आक्रमण विफल रहा तो उसने अपने सेनापत्ति शादमान के नेतृत्व में दूसरी बार पंजाब पर चढ़ाई की. राजा मानसिंह ने उसे परास्त कर डाला. 1581 में हकीम स्वयं पंजाब पर चढ़ आया, भारतीय जनता ने उसका साथ न दिया. अकबर ने उसे परास्त कर काबुल तक उसका पीछा किया और उसकी जागीर जब्त कर ली परन्तु अन्त में उसने हकीम को क्षमा कर काबुल उसे वापिस दे दिया. 1585 में मिर्जा हकीम का देहान्त हो गया.

अकबर ने 1585 में लाहौर में बनाई राजधानी

अपने साम्राज्य की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर अधिक ध्यान देने के लिए अकबर ने 1585 में लाहौर को राजधानी बनाया. 1598 तक वह लाहौर में रहकर अफगानों को दबाने में लगा रहा. अकबर ने स्थिति पर विजय प्राप्त की और इन सबको शान्त करने में सफल हुआ.

राजा बीरबल की मृत्यु

अकबर ने काबुल का सूबा राजा मानसिंह के सुपुर्द कर दिया, परन्तु वह अनुशासनहीन अफगानों को अपने काबू में न रख सका. इस पर अकबर ने राजा बीरबल को काबुल का हाकिम नियुक्त किया.
यूसुफजई पठानों ने बादशाह अकबर के विरुद्ध सिर उठाना शुरू कर दिया था. अकबर को भय था कि वे साम्राज्य के लिए संकट न बन जाएं. इसलिए उसने सेनापति जेन खां कोका को युसुफजई पठानों का मुकाबला करने भेजा. जब जेन खां कोका युद्ध करते करते थक गया तो अकबर ने राजा बीरबल और अब्दुल फतह को उसकी सहायता के लिए भेजा. इन सेनापतियों में पारस्परिक झगड़ा हो गया. जिससे लाभ उठाकर शत्रु ने शाही सेना को बड़ी क्षति पहुंचाई. राजा बीरबल 8000 सिपाहियों के साथ स्वात घाटी में फंस गए और मारे गए. जैनखां बाल-बाल बचा. अब सम्राट ने राजा टोडरमल को तथा अपने पुत्र मुराद को एक विशाल सेना लेकर विद्रोह को दबाने के लिए भेजा.
23 लड़ाइयों के पश्चात् वह युद्ध में सफल हुए. यूसुफजई और अब्दुल्ला पर सम्राट की शक्ति का ऐसा आतंक छा गया कि उन्होंने भारत में घुसने का विचार छोड़ दिया. इस प्रकार अपनी दृढ़ता से अकबर उत्तर- पश्चिमी सीमा समस्या को हल करने में सफल हुआ.

कश्मीर पर अधिकार

कश्मीर का मुसलमान शासक अत्यन्त क्रूर तथा निर्दयी था. वह अपनी हिन्दू जनता के साथ बुरा बर्ताव करता था. अतः अकबर ने कश्मीर पर आक्रमण करने की सोची. सम्राट ने भगवानदास को कश्मीर नरेश यूसुफ शाह के विरूद्ध भेजा. यूसुफ शाह ने सन्धि का प्रस्ताव रखा. परन्तु, अकबर ने उसे अस्वीकार कर दिया. इस पर शाही सेना ने युद्ध प्रारम्भ कर दिया जिसके कारण यूसुफ शाह को आत्म-समर्पण करना पड़ा. उसे एक मनसबदार बना दिया गया और कश्मीर काबुल प्रांत में मिला लिया गया. 1589 में अकबर स्वयं कश्मीर गया और वहां का प्रबन्ध योग्य तथा अनुभवी पदाधिकारियों को सौंपा गया. तब से कश्मीर मुगल-सम्राट का निवास एवं परिभ्रमण स्थान बन गया.

सिन्ध व बलोचिस्तान पर विजय

1574 मुल्तान मुगल बादशाहों के अधिकार में था. वहां का गवर्नर अब्दुरहीम खानखाना था. उसे सिन्ध तथा बलोचिस्तान पर विजय प्राप्त करने का कार्य-भार सौंपा गया. मिर्जा जानीबेग जो सिंध का शासक था, 1592 में दो बार परास्त हुआ. उसने अकबर की अधीनता स्वीकार की. ख्हवान तथा ठट्टा उसने मुगलों को दे दिये. परन्तु खानखाना की सिफारिश पर ठट्टा वापिस कर दिया गया और उसे पांच हजारी मनसबदार धन दिया गया. आगे चलकर दक्षिण विजय में उसने अपनी स्वामि भक्ति का प्रमाण दिया. 1595 में समस्त बलोचिस्तान मुगल आधिपत्य में आ गया.

अकबर की कंधार विजय

सिन्ध और बलोचिस्तान पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् अकबर ने कंधार पर अधिकार प्राप्त करने की इच्छा की. कंधार की स्थिति भी ऐसी थी, जिसके कारण इसका भारतीय आधिपत्य में होना साम्राज्य के लिए आवश्यक था. उधर कंधार के शासक मिर्जा मुजफ्फर हुसैन की स्थिति भी तुर्कों से निरन्तर संघर्ष करने के कारण बहुत शोचनीय थी. अतः उसने स्वयं अकबर को कंधार पर अधिकार प्राप्त करने के लिए निमन्त्रित किया. इस प्रकार 1595 में बिना रक्तपात के कंधार मुगल साम्राज्य में मिल गया. इस विजय ने सीमा समस्या को और भी दृढ़ता प्रदान की.

अकबर की दक्षिण विजय

उत्तरी भारत में अपने साम्राज्य को पूर्णतया दृढ़ कर लेने के पश्चात अकबर ने दक्षिण के मुसलमान राज्यों अर्थात अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा, बीदर करार को जीतने का संकल्प किया. अकबर की साम्राज्यवादी नीति आक्रमण का प्रमुख कारण थी. अकबर को दक्षिण में पुर्तगाल प्रभुतव का निरन्तर बढ़ना सहन नहीं हो रहा था और वह सोचता था कि दक्षिण पर उसका आधिपत्य हो जाए तो वह पुर्तगालियों की शक्ति आसानी से कम कर सकता है.
विजयनगर के हिन्दू-राज्य की समाप्ति के कारण उनकी कोई संयुक्त-योजना न थी. अब वह आपस में लड़ती झगड़ती रहती थी. जिसके कारण वह निर्बल हो गई थी. और अकबर के लिए उस पर विजय प्राप्त करना सरल था.
आक्रमण करने से पहले अकबर ने इन राज्यों के पास अपना प्रभुत्व स्वीकार कराने के लिए सन्धि-पत्र भेजा. परन्तु केवल खानदेश ने प्रस्ताव को स्वीकार किया. अतः शेष भाग के विरूद्ध युद्ध घोषित कर दिया गया.

अहमदनगर पर आक्रमण  और चांदबीबी से युद्ध 

भौगोलिक के कारण सर्वप्रथम अहमदनगर पर आक्रमण हुआ. अकबर को इस पर आक्रमण करने का बहाना भी मिल गया. अहमदनगर की गद्दी के दो अधिकारी थे. उनमें से एक ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर उससे सहायता मांगी. तुरन्त अकबर ने अपने पुत्र मुराद तथा खानखाना अब्दुर्रहीम को एक विशाल सेना सौंप कर अहमदनगर भेजा. उन्होंने 1595 में किले का घेरा डाल दिया.
अहमदनगर के सुल्तान की बहन चांदबीबी बीजापुर की रानी थी और जो अहमदनगर सुल्तान की अल्पायु के कारण स्वयं राज्य प्रबन्ध करती थी. उसने बड़ी वीरता से मुगलों का सामना किया. मुगल सेनापति सन्धि करने पर विवश हो गये. चांदबीबी ने करार के अनुसार प्रदेश तथा वार्षिक कर देना स्वीकार किया, जिसके बदले में मुगल सम्राट ने चांदबीबी के भाई बहादुर शाह को अहमदनगर का सुल्तान मानना स्वीकार किया. परन्तु थोड़े ही दिनों बाद अहमदनगर में गृह कलह हो गया. अबकी बार अकबर स्वयं एक सेना लेकर अहमदनगर पहुंचा और 1599 में बुरहानपुर को छीन लिया. परस्पर दलबन्दी के कारण अहमदनगर के लोग अपनी रक्षा का उचित प्रबन्ध न कर सके जिसके कारण मुगल सेना ने अहमदनगर पर अधिकार कर लिया.

खानदेश पर अधिकार

खानदेश के सुल्तान ने अकबर से संधि-प्रस्ताव तथा उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी. उसकी मृत्यु के बाद 1600 में मीर बहादुर जो बहादुरशाह के नाम से प्रसिद्ध था, खानदेश की गद्दी पर बैठा. उसने मुगल आधिपत्य स्वीकार करने से मना कर दिया. अकबर ने असीरगढ़ के सुदृढ़ दुर्ग का घेरा डाला. कई महीने तक घेरा चलता रहा और अकबर किले का कुछ भी न बिगाड़ सका. अकबर ने किले द्वार पर रिश्वत देकर उस पर विजय प्राप्त की. इस प्रकार खानदेश मुगल-आधिपत्य में आया.

अकबर का साम्राज्य विस्तार

अब अकबर के साम्राज्य में सम्पूर्ण उत्तरी हिन्दुस्तान, उत्तर-पश्चिम में अफगान से लेकर पूर्व में आसाम और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में बीजापुर और गोलकुण्डा की सरहद तक क्षेत्र सम्मिलित था.
इस प्रकार सम्राट ने अपनी मृत्यु के समय तक सुदृढ़ तथा व्यवस्थित साम्राज्य छोड़ा, जो 15 सूबों में विभक्त था. (1) काबुल, (2) लाहौर, (3) मुल्तान, (4) देहली, (5) आगरा, (6) अवध, (7) अजमेर, (8) गुजरात, (9) मालवा, (10) इलाहाबाद, (11) बंगाल, (12) बिहार, (13) खानदेश, (14) यरार, (15) अहमदनगर. वर्ष 1602 में इनसे 17 करोड़ 45 लाख रूपये की आय होती थी.

अकबर के अंतिम दिन Last Days of Akbar

अबुल फजल की मौत

अकबर के जीवन के अन्तिम दिन बड़ी निराशा तथा दुख से व्यतीत हुए. उसके पुत्र दुख का प्रथम कारण थे. उसके तीन बेटे थे. मुराद और दानियाल अधिक शराब पीने के कारण 1599 और 1604 में मर गये थे. उसका बड़ा बेटा सलीम भी बहुत शराब पीता था. बहुत दिन तक सिंहासन पाने की प्रतीक्षा करते-करते वह ऊब गया था. अतः जिस समय अकबर दक्षिण में असीरगढ़ का घेरा डाले पड़ा था, उस समय उसने इलाहाबाद में स्वतन्त्र होने की घोषणा कर दी. यह समाचार पाकर अकबर को बहुत दुख हुआ. वह तुरन्त दक्षिण को चल दिया. सम्राट के दुख को और बढ़ाने के लिए उसने 1602 में ओरछा के राजा वीरसिंह बुन्देला के हाथ अबुल फजल का वध करा दिया.
इस घटना से अकबर इतना नाखुश हुआ कि वह सलीम से अत्यन्त घृणा करने लगा. सलीमा बेगम के प्रयत्न से फिर बाप-बेटे में मेल हो गया. सलीम के समस्त अपराध क्षमा कर दिए गये और अकबर ने उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया.

अकबर की मृत्यु Death of Akbar

वर्ष 1605 में अकबर को सग्रहणी का रोग हो गया और कुछ महीने पश्चात 27 अक्टूबर 1605 को अकबर की फतेहपुर सीकरी में मृत्यु हो गई. मृत्यु शैय्या पर उसने संकेत द्वारा अपने दरबारियों को आदेश दिया कि सलीम को उसका उत्तराधिकारी स्वीकार किया जाये. इसी समय, सलीम को गद्दी से वंचित करने और उसके बेटे खुसरो को राजसिंहासन पर बैठाने का षड्यन्त्र रचा गया. परन्तु यह निष्फल सिद्ध हुआ और सलीम जहांगीर के नाम से गद्दी पर बैठा.

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